Kohramlive : जब भी किसी आंगन में शहनाई की धीमी-धीमी धुन गूंजती है, जब दीवारों पर हल्दी के छींटे और चेहरे पर शर्मीली मुस्कान उतरती है, तब सबसे पहले जो रंग किसी दुल्हन की हथेलियों को छूता है, वो होता है मेहंदी का रंग। मेहंदी, केवल एक रंग नहीं है। ये एक एहसास है। ये उस सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है जो पीढ़ियों से मां से बेटी तक, बहन से भाभी तक, और ननद से सखी तक चली आ रही है। पत्तों से पीसी गई ये हरी सौगात जब हथेलियों पर चढ़ती है, तो उसके साथ-साथ चढ़ता है प्रेम, सौंदर्य, और एक शुभ आरंभ का वादा।
बारीक पैटर्न में ढले फूल, पत्तियां, मोर और मंडल, सिर्फ सजावट नहीं होते, ये एक कहानी कहते हैं। कभी प्रेम की, कभी विरह की, कभी भविष्य की खुशियों की। बुजुर्ग कहती हैं, “मेहंदी जितनी गहरी रचे, ससुराल उतना ही प्यारा होता है।” और फिर दुल्हन घंटों अपनी हथेलियां थामे बैठी रहती है, उस गाढ़े रंग के इंतजार में, जो उसके जीवन की नई शुरुआत का साक्षी बनता है। गर्मियों में जब लू चलती है, तब भी मेहंदी ठंडक लेकर आती है। उसकी मिट्टी सी महक, किसी रिमझिम बारिश में भीगे आंगन की याद दिलाती है। और जब बालों की बात आती है, तो मां के हाथों से घुली मेहंदी, रसायनों से भरे रंगों से कहीं ज्यादा भरोसेमंद और अपनापन लिये होती है। वो न केवल सफेदी को ढकती है, बल्कि बचपन की यादों को दोबारा जीने का जरिया बनती है। मेहंदी केवल हाथों में नहीं रचती, ये रिश्तों में, यादों में और त्योहारों की भीनी-भीनी खुशबू में रचती है। क्योंकि जब भी मेहंदी की पहली लकीर हथेली पर उतरती है, तो उसके साथ एक वादा जन्म लेता है —सजने-संवरने का, खुशियां बांटने का और संस्कृति को जीने का।
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