चोर उचक्का, गुंडा मवाली और उग्रवादियों से लड़ना है फितरत
रांची : फिल्म गुलाम-ए-मुस्तफा का वह किरदार आपको याद होगा, जो दीक्षित परिवार की वफादारी निभाते हुए खुद को पूरी तरह मिटा देता है। झारखण्ड में भी रियल जिंदगी का एक मुस्तफा है, जो चोर उचक्कों, गुंडा, मवाली और उग्रवादियों तक के सामने सीना तान खड़ा हो जाता है। तेवर ऐसा कि हर बुरा काम करने वाले की बंदूक की नाल को खामोश रखने की कूवत रखते हैं। मुस्तफा की नजर में ये महज एक अपराधी हैं और इनकी जगह जहां है, उन्हें वहां तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जान का कोई डर नहीं। उनकी इस बहादुरी को नापतौल कर घबड़ाई खुफिया पुलिस की रिपोर्ट पर जागे प्रशासन ने उन्हें बॉडीगार्ड दिया जरूर, पर हालत ऐसी कि कोई बॉडीगार्ड उनके साथ अकेला रहने की जुर्रत नहीं कर पाता। बुला लिया जाता है वापस पुलिस लाईन। अब तो हाई कोर्ट ने आदेश दे रखा है उन्हें अविलंब अंगरक्षक उपलब्ध कराने का, लेकिन शासन-प्रशासन बना हुआ है मौनी बाबा। इंतजार किस पल का, यह तो मुस्तफा या प्रशासन ही बेहतर बता सकता है। वैसे पूरे झारखण्ड को “अपना घर” बताने वाले मुस्तफा अंसारी का अपना खुद का ठिकाना अनगड़ा के हेसल में है।
खून में गर्मी अभी भी वही, जो ढाई दशक पहले हुआ करती थी
उमर कोई सत्तर साल। नींद खुलते ही लोगों का दुखड़ा, सितम, जुल्म, अत्याचार, रंगदारी और उगाही की कहानी सुनना उनकी अब फितरत सी हो गयी है। अब तो गरीब गुरबों तक की आवाज उनके आंगन में गूंजने लगी है। पुलिस से पहले सताये हुए लोग इनके पास आते हैं, वहीं पुलिस भी कई अनसुलझे केस इनके भरोसे सुलझाती है। भले दुखड़ा अलग-अलग तरह का होता है, लेकिन सब का उपाय खोज निकालते हैं मुस्तफा। लोगों की सुनते-सुनते खुद बैंक के कर्जदार हो गये। कोशिश यही कि कोई हताश निराश या खाली हाथ नहीं लौटे। तीन दिन पहले की बात है, किसी ने उन्हें बताया कि राजधानी में टाना भगत कुनबे की अगुवाई करने वाले खेड़या टाना भगत को लकवा मार गया। वहीं उनकी पत्नी सानो भगताईन भी चल-फिर नहीं पाती। कहने को तो इन्हें तीन बच्चे हैं, लेकिन सबके सब अपने में मस्त। रिश्ते-नातेदार भी यह सोच कर सामने नहीं आते कि कहीं यह रोग उन्हें न हो जाये। छोटे बेटे ने अपनी बेटी को यानी पोती को देखरेख के लिये उनके पास छोड़ रखा है। वह उन्हें खाना बना कर खिलाती है। यह सुनते ही मुस्तफा निकल पड़े बेड़ो के खक्सीटोला गांव और इस कंपकंपाती ठंड में सबसे पहले उन्हें कंबल ओढ़ाया, ईलाज और दवा का जुगाड़ कर वापस लौटे तो उनके मुख से सिर्फ इतना निकला कि टाना भगत परिवार के साथ यह बेरुखी ठीक नहीं। सरकार को जरूर सोचना चाहिए।
आवाम मुस्तफा की ताकत
मध्यम परिवार से ताल्लुकात रखने वाले मुस्तफा अंसारी को सालों पहले पीएलएफआई के नाम पर एक परचा थमाया गया, जिसमें उनसे 10 लाख रुपये बतौर रंगदारी मांगी गयी। पहले सिर्फ सुना करते थे जुल्मों सितम की कहानी। जब खुद शिकार हुए, तब जागे और यह सोच कर बगावत कर बैठे कि कायर की जिंदगी जीने से अच्छा है बागी होकर “मर“ जाना। वर्ष 2011 में एक आईपीएस अधिकारी ने उन्हें इस लड़ाई में पूरा साथ देने का वादा किया। नतीजा एरिया कमांडर से लेकर दस्ते के कई लोग पहुंच गये, सलाखों के पीछे। हालांकि इस लड़ाई में उनके गांव के चार लोगों को जान गंवानी पड़ी। पर मुस्तफा कभी थके हारे या डरे सहमे नहीं। आज की तारीख में उनकी ताकत बनी हुई है आवाम, भले ही पुलिस ने उनकी खोज खबर लेनी छोड़ दी है।
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