kohramlive desk : प्रसिद्ध इतिहासकार और पद्म विभूषण से सम्मानित बलवंत मोरेश्वर पुरंदरे का लंबी बीमारी के बाद सोमवार को 99 साल की एम्र में पुणे के दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल में निधन हो गया। उन्हें बाबासाहेब पुरंदरे के नाम से भी जाना जाता है। पुरंदरे के निधन पर प्रधानमंत्री मोदी ने शोक व्यक्त किया। उन्होंने ट्वीट करके कहा कि शिवशहीर बाबासाहेब पुरंदरे अपने व्यापक कार्यों के कारण जीवित रहेंगे। इस दुख की घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिवार और अनगिनत प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति।
Shivshahir Babasaheb Purandare will live on due to his extensive works. In this sad hour, my thoughts are with his family and countless admirers. Om Shanti.
— Narendra Modi (@narendramodi) November 15, 2021
गृहमंत्री अमित शाह ने अपनी संवेदनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि कुछ वर्ष पूर्व बाबासाहेब पुरंदरे जी से भेंट कर एक लंबी चर्चा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उनकी ऊर्जा और विचार सचमुच प्रेरणीय थे। उनका निधन एक युग का अंत है। उनके परिजनों व असंख्य प्रशंसकों के प्रति संवदेनाएं व्यक्त करता हूं। प्रभु उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें। ॐ शांति। एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने ट्वीट करते हुए कहा कि शिवशहीर बाबासाहेब पुरंदरे के निधन के साथ, महाराष्ट्र ने साहित्य और कला के क्षेत्र में अपनी चमक खो दी। उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि।
बाबासाहेब पुरंदरे जी के स्वर्गवास की सूचना से अत्यंत व्यथित हूँ। उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज जी के गौरवशाली जीवन को जन-जन तक पहुँचाने का भागीरथ कार्य किया। जाणता राजा नाटक के माध्यम से उन्होंने धर्म रक्षक छत्रपति शिवाजी महाराज की शौर्य गाथाओं को युवा पीढ़ी के हृदय में बसाया। pic.twitter.com/tSmE0R82Vq
— Amit Shah (@AmitShah) November 15, 2021
शिवशाहीर बाबासाहेब पुरंदरे यांच्या निधनाने महाराष्ट्राने साहित्य, कला क्षेत्रातील अध्वर्यू गमावला.
त्यांना भावपूर्ण श्रद्धांजली!— Sharad Pawar (@PawarSpeaks) November 15, 2021
30 साल की उम्र में शुरू किया लिखना
जाने लें कि बाबासाहेब पुरंदरे की सबसे प्रसिद्ध रचना शिवाजी की जीवनी थी जिसका शीर्षक ‘राजा शिवछत्रपति’ था। उन्होंने 1952 में 30 साल की उम्र में इसे लिखना शुरू किया और 1956 में इसे प्रकाशित किया। छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन और चरित्र पर जबरदस्त जन अपील का यह नाटक 1985 में प्रकाशित हुआ था और उसी वर्ष पहली बार इसका मंचन भी किया गया था।
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