Ranchi (Bhawna/Nandani) : मेरी मां का एक ख्वाब था कि मैं भी अफसर बनूं। मां जब कभी सीरियल अफसर बिटिया देखने टीवी के सामने बैठती थी, तभी मुझे पुकारती थी। कहती थी दिव्या क्या तुम अफसर नहीं बन सकती। मेरा अरमान है कि तुम भी अफसर बिटिया बनों औऱ कुछ अलग कर दिखाओ। शुरू-शुरू में मुझे लगा यह तो हर मां-बाप का सपना होता है। पर मेरी मां जब कभी बोलती थी तब मैं उनकी आंखों में पलते सपने को तैरते हुए देखा करती थी। बस मैंने ठान लिया कि जैसे भी हो बनकर दिखाउंगी अफसर बिटिया। कुछ भी हासिल किया जा सकता है जरूरत है बस जूनून, जजबा और समर्पण। बैग कितना भारी और हल्का है… यह मायने नहीं रखता। किताबी डिग्री से ज्यादा जरूरी है प्रैक्टिकल डिग्री।
कहते हैं न कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। बस मैंने भी खोई कुछ नींद और बाकी कुछ शौक। सखी-सहेलियों और दोस्तों की रूटीन देख कभी-कभी मेरा भी मन डोलता था कि मैं भी घूमूं-फिरूं। सोशल मीडिया पर एक्टिव रहूं। ऐसा भी नहीं था कि मैंने यह सबकुछ त्याग दिया था। सोशल मीडिया से अपटूडेट खबरें मिलती रही और जेनरल नोलेज भी बढ़ा। कुछ मेहनत करनी पड़ी और थोड़ी ज्यादा पढाई करनी पड़ी। क्योंकि किताबें और विषय इतने होते हैं कि अगर आप एक-एक घंटा भी दें तो सात से आठ घंटे पढ़ना ही पड़ता है। आपको यकीन नहीं होगा इंटरव्यू के पहले ही सवाल का जवाब नहीं दे पाई थी। पर बाकी सब ठीक था तो पास कर गयी। कोई मुझे हुजूर, माई-बाप, सरकार या अफसर बोले… यह अपना शौक नहीं। बस मकसद है जो जिम्मेदारी मिली है, उसे बढ़िया तरीक से निभा जाऊं। दिव्या अपनी कामयाबी के पीछे पिता डीके श्रीवास्तव और शिक्षक अमरदीप सिन्हा का नाम लेना नहीं भूलती। बीपीएससी की परीक्षा पास कर रेवेन्यू अफसर की नौकरी हासिल करने वाली रांची हरमू हाउसिंग कालोनी की रहने वाली दिव्या सिन्हा कैसे अपनी मां का ख्वाब पूरा कर पाई, सुनें उन्हें…
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