भाई शहीद हो गया, अब कौन उठायेगा बहनों की डोली
रांची (सत्य शरण मिश्र) : “भाई ने हम तीन बहनों की शादी को लेकर खूब सपने देखे थे। कहता था– अच्छे घर में शादी कराऊंगा। बहनों की शादी में खूब नाचूंगा। लेकिन सारे सपने ढह गये। मेरा भाई हम तीन बहनों की धूमधाम से शादी कराने का मां से वादा करके गया था। हमें भी हमारी भावी जिंदगी के खूबसूरत सपने दिखा कर गया था। लेकिन वह सरहद से शहीद होकर लौटा। हमारे अरमान भाई की शहादत के साथ ही मिट गये। मेरा भाई चला गया। अब हम तीन बहनों को कौन देखेगा, मां को कौन देखेगा। अब तो हमारा कोई भाई भी नहीं है। कौन करायेगा हमारी शादी।” यह कहते हुए भर गई शहीद रंजीत खलखो की बहन की आंखें। अब उन्हें इंतजार है एक “भाई” का।
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न खाने का मन करता है, न सोने का। दिन-रात उसी के बारे में सोचते रहते हैं। रात को नींद टूट जाती है तो उठ कर बैठ जाते हैं। हमारी बेटियों की शादी कौन करायेगा। यह कहते हुए शहीद रंजीत की मां रोलेन खलखो की आंखों से आंसू की धार टपक पड़ती है। उनकी आंखों में गम का समंदर कितना गहरा है, उसकी थाह पाना मुश्किल है।
भाई के जाने के गम में बहनों का बुरा हाल है। भाई होता तो सभी बहनों की शादी धूमधाम से होती। मंझली बहन सरस्वती खलखो भाई को याद कर रो पड़ती है। कहती है हमारा परिवार टूट चुका है। भाई के गम में मां हर वक्त रोती रहती है। परिवार को मुआवजा की राशि तो सरकार से मिल गई है, लेकिन किसी सदस्य को अबतक सरकारी नौकरी नहीं मिली। वहीं रंजीत की प्रतिमा बनवाने में भी किसी तरह की सरकारी मदद नहीं मिली। डबडबाई आंखों से सरस्वती कहती है। लोगों के लिए त्योहार खुशियां लेकर आता है, लेकिन हमारे लिए क्या पर्व, क्या उत्सव।
देश की सेवा में अपनी जान गंवाने वाले जांबाज सिपाही की मां की सिसकियों और बहनों का दर्द महसूस करने वाला कोई नहीं है। जिन लोगों ने परिवार के साथ हर वक्त खड़े रहने की बात कही थी आज वो ही इस परिवार से नजरें चुराने लगे हैं। आखिर कौन उठायेगा शहीद की तीन बहनों की डोली।
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