Kohramlive : भारत के प्राचीन मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के लिये पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। इन्हीं में उत्तर प्रदेश के वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर का नाम भी बड़े सम्मान से लिया जाता है। यह मंदिर सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का केंद्र ही नहीं, बल्कि अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण भी लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। यहां आरती होती है, भजन-कीर्तन भी होता है, लेकिन एक बात सबसे अलग है, आरती के समय न तो घंटियां बजाई जाती हैं और न ही ऊंचे स्वर में आरती गाई जाती है। वृंदावन स्थित यह मंदिर भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ा प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है। हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिये पहुंचते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना पर बांके बिहारी जी अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
बाल कृष्ण की सेवा से जुड़ी है यह परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बांके बिहारी मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण बाल स्वरूप में विराजमान हैं। इसी वजह से मंदिर में उनकी सेवा भी एक छोटे बच्चे की तरह की जाती है। मान्यता है कि तेज घंटियों की आवाज या ऊंचे स्वर में गाई गई आरती से बाल गोपाल की विश्रांति और शांति भंग हो सकती है। इसी श्रद्धा और वात्सल्य भाव के कारण यहां आरती के दौरान घंटियां नहीं बजाई जातीं। यह परंपरा भगवान को केवल पूजनीय देवता नहीं, बल्कि परिवार के एक दिव्य बालक के रूप में मानने की भावना को दर्शाती है।
मंदिर की दूसरी अनोखी परंपरायें भी हैं खास
बांके बिहारी मंदिर अपनी कई विशिष्ट परंपराओं के लिये भी प्रसिद्ध है।
- ठाकुर जी के सामने कुछ-कुछ समय के अंतराल पर पर्दा लगाया जाता है।
- गर्भगृह में लगातार भजन-कीर्तन चलता रहता है।
- भक्त इन परंपराओं को भगवान और श्रद्धालुओं के बीच गहरे आध्यात्मिक प्रेम का प्रतीक मानते हैं।
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