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भरोसे की छत के नीचे दम तोड़ता एक परिवार

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परिवार की माली हालत बिलकुल खराब, नौकरी की आस में गुजर गए 7 साल

रांची (श्रद्धा छेत्री/धीरज) : वो जांबाज था… वो सरताज था… दिलेर इतना कि अपराधियों के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने को बेताब रहता था. पुलिस का दोस्त, अपराधियों का दुश्मन। दुश्मनों ने तो उसका सीना छलनी कर दुश्मनी की रीत निभाई लेकिन दोस्तों ने जो किया वो किसी दगा से कम नहीं। पुलिस के सबसे बड़े मददगार और क्रिमिनल्स के काल के रूप में मशहूर एसपीओ बजेंदर सिंह की पत्नी सुकृति कुछ यूं अपना आक्रोश भरा दर्द बयां करती हैं… कहती हैं, वफादारी का ऐसा ईनाम… जो न कभी सोचा था न देखा न सुना था…पर आप देखेंगे… आप देखेंगे पूरी कहानी कि पति की शहादत के बाद आखिर क्यों और किनके प्रति दिलेर की पत्नी में भरा है इतना आक्रोश।

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पुलिस का सबसे करीबी मुखबिर था बजेंदर सिंह

बजेंदर पुलिस का सबसे करीबी मुखबिर था। उसकी पहचान पुलिस के सबसे बड़े मददगार और उग्रवादियों के दुश्मन के रूप में मशहूर थी। पेशे से एक ठेकेदार। पुलिस को बजेंदर की वफादारी और जज्बा इतना भाया कि उसे अपने थाने का एसपीओ यानी स्‍पेशल पुलिस ऑफिसर बना डाला। काम जोखिम भरा जरूर था, मगर बजेंदर ने कभी अपने फ़र्ज़ का दामन नहीं छोड़ा। नक्‍सलियों की ओर से उसे जान से मारने की धमकी मिल रही थी। इसकी जानकारी पुलिस को भी थी। 2 जुलाई 2013 को सुबह आठ बजे के करीब रांची के चुटिया थाना के सामने उसे बाइक सवार दो अपराधियों ने गोली मार दी। आम लोगों के सहयोग से गुरुनानक अस्‍पताल ले जाया गया, जहां डॉक्‍टरों ने मृत घोषित कर दिया। उसकी मृत्‍यु के सात साल बीत चुके हैं, पर अब भी परिवार इंसाफ की आस लगाए बैठा है। इस वारदात से पहले भी बजेंदर को एक बार गोली मारी गयी थी। तब वह बच गया था। गोली तब मारी गयी थी, जब वह अपनी बेटी को स्कूल पहुंचाकर अपनी बुलेट से घर लौट रहा था।

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मेरे साथ पुलिस है, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता : बजेंदर को था यकीन

बजेंद्र की पत्नी जब भी कहती कि इतना जोखिम भरा काम क्यों करते हैं, कल अगर आपको कुछ हो जाए, तो कौन देखेगा हमें। इस पर बजेंदर कहते कि मेरे साथ पुलिस है। इसलिए मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। पीएलएफआई ने बजेंदर को कई बार जान से मारने की धमकी भी दी, मगर बजेंदर ने उसकी बात को हवा में उड़ा दिया. उसे यह एहसास नहीं था कि भरोसे की छत के नीचे ही उसकी जान चली जाएगी।

बेटी की शादी को बीता था सिर्फ एक महीना

आज भी बजेंदर की पत्नी उस मनहूस सुबह को याद कर सिसक उठती हैं। बड़ी बेटी को ब्याहे एक ही महीना हुआ था। वह मायके आई थी। यह मुलाकात उसके पिता से आखिरी मुलाकात साबित होगी, वह नहीं जानती थी। रोज की तरह बजेंदर थाने के पास चाय की चुस्की लेते हुए अख़बार पढ़ रहे थे कि तभी अचानक मोटरसाइकिल पर सवार दो लोग आए और बजेंदर पर गोली दाग कर भाग गए। अपराधी को पकड़ना तो दूर पुलिस बजेंदर को देखने के लिए थाने से बाहर तक नहीं आई। बजेंदर की पत्नी चीखती-बिलखती रही, मगर बजेंदर को अपना कहने का दम भरने वाले पुलिस के उसके दोस्त, कान में तेल डाले सोये रहे।

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मंझले बेटे की भी हो चुकी है मौत

बीते सात सालों में बजेंदर का परिवार पुलिस विभाग से मदद पाने के लिए डीएसपी से लेकर डीजीपी के दर पर बार-बार गुहार लगाता रहा, पर कोई मदद नहीं मिली। सिर्फ आश्‍वासन मिलता रहा। इस बीच बजेंदर के मंझले बेटे की मौत हो चुकी है। परिवार की माली हालत बहुत खराब हो चुकी है। बड़े बेटे सकलदीप को अब भी आस है कि सरकार उसकी जरा सी मदद कर देती, तो परिवार का भरण-पोषण करने में सहूलियत होती।

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