Bokaro(Parmeshwar Mandal) : हाई फीवर और बदन दर्द से परेशान लोगों का माथा दर्द तब और बढ़ जाता है जब वे बोकारो चास के अनुमंडल अस्पताल में पहुंचते हैं। दुख-दर्द से निजात पाने की चाह में अस्पताल में भर्ती मरीजों की जिंदगी राम भरोसे रहती है। बेड है तो साफ चादर नहीं, लाइट की कोई गारंटी नहीं, रात में बत्ती गुल होती है तो दूर तक अंधेरा ही अंधेरा। डर-भय से कोई हिलता-डुलता तक नहीं। बाथरूम है तो दरवाजा नहीं। सबसे बुरा हाल तो लेडिज टायलेट का है। इलाज शुरू हो जाये तो जांच की कोई सुविधा नहीं। दवा के लिये पूर्जा थमा बाहर से दवायें खरीद लाने को कहा जाता है। अस्पताल का जांचघर तो केवल नाम का। जांच छोटा हो या बड़ा, बाहर ही जांच कराना पड़ता है। शाम होते ही मरीजों और उनके अटेडेंट की रूह कांपने लगती है। ना जाने कब बत्ती गुल हो जाये। बत्ती गुल होने पर लाइन कब आयेगी, इसे देखने, सुनने या झांकने वाला कोई नहीं। अस्पताल में कोई जेनरेटर नहीं। डीजल की बात करना तो यहां बिल्कुल गलत होगा। एक इनवर्टर है, आधा-एक घंटे में ही दम तोड़ देता है। सारी बत्तियां भुकभुका कर बुत जाती है। अंधेरा होते ही मरीजों की कराहने की आवाज अजीब सा डरा जाती है। इस अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों का अपना कई तरह का दर्द है। उन्हें सुनने वाला कोई नहीं। बोकारो के सिविल सर्जन डॉ. अभय प्रसाद ने कोहराम लाइव से कहा कि आपके माध्यम से जानकारी मिली है, पहले पूरे मामले की जानकारी ली जायेगी। अस्पताल में आयुष्मान के तहत डीजल का इंतजाम करने की सुविधा है, ऐसे में डीजल की कमी क्यों रहती है। अस्पताल में अंधेरा क्यों है, इस बारे में जानकारी ली जायेगी।
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