UP : SRN अस्पताल के नर्सिंग हॉस्टल में जब सुबह की हल्की धूप खिड़कियों से अंदर झांक रही थी, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि एक मासूम ज़िंदगी हमेशा के लिये अंधेरे में समा जायेगी। हॉस्टल की गलियों में पसरी खामोशी को प्रीति सरोज की आखिरी चीख ने जैसे चीर दिया था। उन्नीस-बीस की उम्र, आंखों में डॉक्टर बनने का सपना, मगर किस्मत ने ऐसा दर्द लिखा कि वो ज़िंदगी से हार गई। लगभग 20 साल की प्रीति सरोज ने पंखे से लटककर अपनी कहानी का आखिरी पन्ना खुद ही लिख दिया। यह नर्सिग हॉस्टल प्रयागराज में है।
प्रीति की तकलीफ कोई आम दर्द नहीं थी। उसके कानों में लगातार गूंजती असहनीय खुजली, पूरे शरीर में होने वाली बेचैनी, और इसके साथ उन लोगों के ताने जो उसकी पीड़ा को समझने के बजाय उस पर हंसते थे। “भगवान ने बहुत दुख दिया है… अब और नहीं सह सकती,” उसने अपने आखिरी शब्दों में लिखा। सुबह उसने अपनी सहेली से कहा, “थोड़ी देर बाहर चली जाओ, मुझे दवा लगानी है।” मगर कौन जानता था कि वो दर्द की उस कैद से खुद को हमेशा के लिये आजाद करने जा रही है। जब दरवाज़ा तोड़ा गया, तो वहां हवा में उसकी अंतिम चीख की गूंज बाकी थी और पंखे से झूलती उसकी नन्ही देह। कौशाम्बी के एक छोटे से गांव से निकली प्रीति, जिसने सोचा था कि पढ़-लिखकर मां-बाप के सपनों को ऊंचाई देगी, आज खुद मौत की गहराइयों में समा गई। बीमारी की पीड़ा, दूसरों की बेरुखी और अंदर का टूटता हौसला… शायद ये सब उसकी मासूम हंसी को लील गया।
घर में मातम था। मां शांति देवी बार-बार फूटकर रोतीं, “गरीबी से लड़ना सिखाने वाली मेरी बेटी खुद हार गई!” पिता शत्रुघ्न सरोज, जो मजदूरी कर बेटी को पढ़ा रहे थे, पत्थर की तरह जड़ खड़े थे। “सरकारी कॉलेज मिला था, लग रहा था कि घर के हालात बदलेंगे… पर सब खत्म हो गया…” उनके इस एक वाक्य में एक बाप की टूटी उम्मीदें सिसक रही थीं।प्रीति, जो दूसरों की तकलीफें दूर करने के लिए डॉक्टर बनना चाहती थी, खुद अपनी पीड़ा का इलाज नहीं ढूंढ पाई।
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