Chouparan(Krishna Paswan) : झारखंड की हरी-भरी वादियों के बीच बसी है एक ऐसी डरावनी सच्चाई, जिसे अब लोग ‘मौत की घाटी‘ कहने लगे हैं। नाम है, दनुआ घाटी। हजारीबाग के चौपारण से चोरदाहा की तरफ बढ़ते ही सड़क जैसे अपना रूप बदल लेती है। नेशनल हाईवे-33 का ये हिस्सा, टेढ़े-मेढ़े मोड़ों, ढलानों और अदृश्य खतरे से भरा हुआ है। यहां की दनुआं घाटी, अब दहशत और मातम का पर्याय बन चुकी है। जिन रास्तों से लोग मंज़िल तक पहुंचने का सपना देखते हैं, उन्हीं रास्तों ने 150 से ज्यादा घरों में मातम पहुंचा दिया है। मतलब, हर एक्सीडेंट एक नई कहानी, हर मौत एक अधूरी जिंदगी। ‘जोड़रही पुल’ जानलेवा बनता जा रहा है। इस पुल का डिवाइडर कब टूटा, किसी को याद नहीं। लेकिन हर किसी को याद है, कितनी गाड़ियां इस पुल के अंदर समा गईं। ना NHAI की नजर गई, ना सिस्टम की जिम्मेदारी जागी। यहां ना चेतावनी बोर्ड, ना स्पीड ब्रेकर, ना मोड़ पर लाइट का इंतेजाम है। कुछ लोगों का कहना है कि दनुआ घाटी में मौत कोई ‘रूटीन’ हो। घाटी के आसपास रहनेवाले कुछ गांव वालों का कहना है कि हम रोज डर के साये में सफर करते हैं, ना जाने किसकी गाड़ी अगली होगी।” लोगों का सवाल है कि क्या इस घाटी में कभी उजाला होगा? या फिर दनुआ घाटी यूं ही हर सफर की आखिरी मंजिल बनती रहेगी।
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