Kohramlive : जब रंगों की मस्ती हर घर में पकवानों की खुशबू बिखेरती है, उसी दिन मारवाड़ी समाज के कई घरों में चूल्हा ठंडा पड़ जाता है। होलिका दहन की रात ही सारे पकवान बन जाते हैं और फिर पूरे आठ दिनों तक तला-भूना खाना वर्जित रहता है। ठंडा या पहले से बना भोजन ही प्रसाद की तरह ग्रहण किया जाता है, सिर्फ सादा भोजन, बिना तड़का, बिना तलना। मान्यता है कि होली के आठ दिन बाद शीतला माता की पूजा होती है, तब तक नये कपड़े नहीं खरीदे जाते, न पहने जाते। पूजा के दिन भी चूल्हा नहीं जलता, बासी या ठंडा भोजन ही भोग के रूप में स्वीकार किया जाता है। नीतू केजरीवाल बताती हैं कि कहते हैं, एक बार होली के दिन गांव में भीषण आग लगी, सब कुछ जल गया, मगर एक वृद्धा का घर सुरक्षित बच गया। वृद्धा बोलीं, “मैं शीतला माता की पूजा करती हूं।” बस, तभी से यह परंपरा समाज की सांसों में बस गई। बीमार और बुजुर्गों को छूट मिलती है, लेकिन परंपरा का सम्मान हर दिल में कायम रहता है। सवा सौ साल से भी ज्यादा पुरानी यह परंपरा आज भी मारवाड़ी समाज की आस्था, अनुशासन और संस्कृति की पहचान है।
मारवाड़ी समाज की अनूठी परंपरा, होली पर नहीं जलता…
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