Ranchi : झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के घने जंगलों में अगर किसी एक नाम ने दशकों तक सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ाई, तो वह नाम था मिसिर बेसरा। माओवादी संगठन की दुनिया में वह सिर्फ एक कमांडर नहीं, बल्कि रणनीतिकार, गुरिल्ला ऑपरेशन का मास्टर और संगठन का प्रभावशाली चेहरा माना जाता रहा। उस पर झारखंड सरकार ने एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित कर रखा था। आज उसका नाम नक्सलवाद के सबसे चर्चित चेहरों में गिना जाता है। लेकिन यह सफर शुरू हुआ था एक साधारण परिवार से।
कौन है मिसिर बेसरा?
मिसिर बेसरा (जिसे अलग-अलग दस्तावेजों में मिशिर बेसरा या मिसिर बासरा भी लिखा गया है) मूल रूप से पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले का रहने वाला माना जाता है। संथाल समुदाय से जुड़े बेसरा ने युवावस्था में वामपंथी उग्रवादी विचारधारा का रुख किया और धीरे-धीरे भूमिगत संगठन का हिस्सा बन गया। करीब तीन दशक पहले उसने जंगल की राह पकड़ ली। इसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। शुरुआत एक साधारण कैडर के रूप में हुई। लेकिन तेज दिमाग, इलाके की गहरी समझ, संगठन के प्रति निष्ठा और गुरिल्ला युद्ध की रणनीति ने उसे तेजी से ऊपर पहुंचा दिया। समय के साथ वह माओवादी संगठन के शीर्ष सैन्य नेतृत्व में शामिल हो गया। उसे झारखंड, ओडिशा और बंगाल के सीमावर्ती जंगलों में कई बड़े ऑपरेशन की जिम्मेदारी सौंपी गई। सुरक्षा एजेंसियां उसे संगठन के सबसे प्रभावशाली कमांडरों में गिनती रही हैं।
सारंडा बना सबसे मजबूत गढ़
पश्चिमी सिंहभूम का सारंडा जंगल, जहां सूरज की रोशनी भी कई जगह मुश्किल से पहुंचती है, लंबे समय तक मिसिर बेसरा का सुरक्षित ठिकाना माना जाता रहा। यहीं से उसने कोल्हान, पोड़ाहाट, सरायकेला-खरसावां, चाईबासा और ओडिशा सीमा तक अपना प्रभाव कायम रखा। जंगल की हर पगडंडी, हर पहाड़ी और हर रास्ते की जानकारी उसके दस्ते की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, मिसिर बेसरा का नाम वर्षों के दौरान कई बड़े नक्सली हमलों, बारूदी सुरंग विस्फोट, पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों पर हमलों, हथियार लूटने और लेवी वसूली से जुड़े मामलों में सामने आया। विभिन्न राज्यों में उसके खिलाफ अनेक आपराधिक मामले दर्ज हैं।
क्यों रखा गया एक करोड़ का इनाम?
माओवादी संगठन में उसकी हैसियत और लंबे समय तक गिरफ्तारी से बचते रहने के कारण झारखंड सरकार ने उस पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया। यह इनामी राशि उसे देश के सबसे वांछित नक्सली नेताओं में शामिल करती रही। मिसिर बेसरा को केवल फील्ड कमांडर नहीं, बल्कि रणनीति बनाने वाला नेता भी माना जाता रहा। उसकी फितरत छोटे-छोटे गुरिल्ला दस्तों का संचालन। जंगल आधारित युद्धक रणनीति। बारूदी सुरंग और एम्बुश की योजना। संगठन के लिये गये कैडर तैयार करना। लेवी नेटवर्क और रसद व्यवस्था पर निगरानी करनी थी।
पिछले कुछ वर्षों में क्यों कमजोर पड़ा नेटवर्क?
समय बदला और हालात भी। सारंडा और कोल्हान में लगातार सुरक्षा कैंप बने। नई सड़कें पहुंचीं। ड्रोन और आधुनिक निगरानी तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा। कई बड़े नक्सली मारे गये या गिरफ्तार हुये। सैकड़ों कैडरों ने आत्मसमर्पण किया। इन सबके बीच मिसिर बेसरा का नेटवर्क लगातार कमजोर पड़ता गया। झारखंड में CRPF के IG के पद पर आते ही जांबाज एवं तेज-तर्रार IPS अधिकारी माने जाने वाले साकेत कुमार सिंह द्वारा बुने गये जाल में कई खूंखार और बदमाश फंसते चले गये। अपराधियों और उग्रवादियों के इल्म के जानकार IG साकेत कुमार सिंह को गुप्त सूचना मिली थी कि मोस्ट वांटेड मिसिर बेसरा गिरिडीह इलाके में पनाह लिये हुये हैं। इस सूचना को गंभीरता से लिया गया। इसके बाद बेसरा बड़े आराम से पकड़ा गया। उसके साथ कुख्यात और बेसरा का खासमखास मोछू और बेसरा का बाडी गार्ड भी धरा गया। तीनों से हथियार सप्लाई नेटवर्क, लेवी वसूली तंत्र, सक्रिय कमांडरों, शहरी संपर्क सूत्रों, भूमिगत ठिकानों, विस्फोटक भंडार एवं वित्तीय नेटवर्क की जानकारी जुटाई जा रही है।






