Kohramlive : सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। बाबा महाकाल की भस्म आरती को मंदिर की सबसे प्रमुख और आध्यात्मिक परंपराओं में से एक माना जाता है, जिसके दर्शन के लिये देश-विदेश से भक्त पहुंचते हैं।
ब्रह्म मुहूर्त में होती है भस्म आरती
महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त के समय भस्म आरती का आयोजन किया जाता है। इस दौरान भगवान महाकाल के ज्योतिर्लिंग का पवित्र भस्म से श्रृंगार किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भस्म जीवन की नश्वरता और आत्मा की शाश्वतता का प्रतीक है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार, भस्म आरती केवल एक पूजा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के सत्य को समझाने वाली आध्यात्मिक परंपरा है। यह मनुष्य को यह संदेश देती है कि भौतिक जीवन क्षणभंगुर है और आत्मिक चेतना ही स्थायी है।
12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है महाकालेश्वर मंदिर
उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां विराजमान भगवान महाकाल स्वयंभू हैं और दक्षिणमुखी होने के कारण इस ज्योतिर्लिंग का विशेष महत्व है। मंदिर की भस्म आरती को विश्वभर में प्रसिद्ध माना जाता है। इस दिव्य अनुष्ठान में शामिल होने के लिये श्रद्धालु काफी पहले से ऑनलाइन बुकिंग और दर्शन व्यवस्था की प्रक्रिया पूरी करते हैं। महाकाल मंदिर में दिनभर में छह प्रमुख आरतियां होती हैं, जिनमें भस्म आरती सबसे खास मानी जाती है। इसके बाद भगवान शिव को अलग-अलग स्वरूपों में सजाया जाता है। पहली आरती भस्म आरती होती है। दूसरी आरती में भगवान शिव को घटाटोप स्वरूप दिया जाता है। तीसरी आरती में हनुमान स्वरूप का श्रृंगार किया जाता है। चौथी आरती में शेषनाग स्वरूप की झांकी सजती है। पांचवीं आरती में भगवान शिव को दूल्हे के रूप में सजाया जाता है। छठी शयन आरती में भगवान के विश्राम स्वरूप के दर्शन होते हैं।
भस्म का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भस्म भगवान शिव के वैराग्य और संहार शक्ति का प्रतीक है। राख यह संदेश देती है कि संसार की हर वस्तु एक दिन समाप्त हो जाती है। इसी कारण शिव को भस्म धारण करने वाला देवता भी कहा जाता है। मान्यता है कि भस्म आरती के दौरान मंत्रोच्चारण, डमरू और शंख की ध्वनि से वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। भक्त इसे मन की शांति और आत्मिक अनुभव से जोड़ते हैं। ऐतिहासिक रूप से माना जाता है कि महाकाल की भस्म आरती में श्मशान की पहली चिता की राख का उपयोग किया जाता था। हालांकि वर्तमान समय में मंदिर में विशेष विधि से तैयार की गई भस्म का उपयोग किया जाता है। सावन महीने में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व होने के कारण महाकाल मंदिर में भक्तों की संख्या काफी बढ़ जाती है। श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन, जलाभिषेक और भस्म आरती में शामिल होकर आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करने की कामना करते हैं। ज्योतिषाचार्य के हवाले से मीडिया में आई खबर के अनुसार, महाकाल की भस्म आरती आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक दर्शन का ऐसा संगम है, जो सदियों से भक्तों को आकर्षित करता आ रहा है।






