UP : चिकित्सा की दुनिया से अपराध की गलियों तक और फिर अध्यात्म के चोले में छिपा राक्षस। यह कहानी है डॉक्टर देवेंद्र शर्मा की, एक ऐसा नाम जो कभी आयुर्वेद का ज्ञाता था, फिर बना देश का सबसे कुख्यात ‘डॉक्टर डेथ’। 1990 के दशक में जब देश मेडिकल सुधारों की ओर बढ़ रहा था, तब एक BAMS डॉक्टर ने वो रास्ता चुना जो मौत की घाटियों से होकर गुजरता था। कासगंज की हजारा नहर, जहां आमतौर पर लोग ठंडी हवा के लिये जाते हैं, वो नहर उसके लिये कब्रगाह बन चुकी थी। मगरमच्छों को चारा नहीं, इंसानी जिस्म परोसा जाता था।
डॉक्टर शर्मा और उसके गुर्गे बड़े ही सुनियोजित ढंग से टैक्सी और ट्रक चालकों को फर्जी ट्रिप के बहाने बुलाते। एक बार जो गाड़ी में बैठा, वो फिर कभी लौटकर नहीं आया। उसकी लाश उस नहर में जाती जहां सबूत खत्म हो जाते और मगरमच्छों की दावत सजती। गाड़ियां? उन्हें बेचा जाता ग्रे मार्केट में। वहीं, रकम जाती उस खौफनाक साम्राज्य की जड़ें मजबूत करने में। शुरुआत हुई 1994 में, एक गैस डीलरशिप डील में नुकसान के बाद। असफलता ने उसे अपराध की ओर ढकेला और फिर एक किडनी रैकेट के साथ जुड़ाव हुआ। 125 से अधिक अवैध ट्रांसप्लांट करवाने की बात उसने खुद कबूली। डॉक्टरों, दलालों और बिचौलियों का जाल बिछाया गया और इसमें लोगों की जिंदगी को सिर्फ एक ‘ऑर्गन की कीमत’ पर तौला गया। फिर आया वो दौर, जब न सिर्फ किडनी, बल्कि जिंदगी भी उसकी ‘सर्जरी’ का शिकार बनने लगी।
2004 में पहली गिरफ्तारी, लेकिन वो तो बस शुरूआत थी। सात राज्यों में सात सजायें, कहीं उम्रकैद, कहीं मौत। लेकिन 2023 में पैरोल पर निकला और फिर फरार हो गया, इस बार एक ‘पुजारी’ बनकर। राजस्थान के दौसा के एक आश्रम में, जहां लोग आध्यात्म की तलाश में आते थे, वहां छुपा था एक ऐसा शैतान जो कई परिवारों को हमेशा के लिये श्मशान का रास्ता दिखा चुका था। दिल्ली क्राइम ब्रांच ने छह महीने की जद्दोजहद के बाद उसे दबोचा। दिल्ली से अलीगढ़, जयपुर से प्रयागराज, हर जगह उसकी परछाईं थी, लेकिन चेहरा छुपा था। और अंत में दौसा के आश्रम में, झूठे वेश में, एक नया नाम लिये हुये, वो फिर पकड़ में आया।
हजारा नहर का सौदागर
साल था 2002, जगह—उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सरहद के पास का एक सुनसान इलाका। देवेंद्र शर्मा के मन में अब सिर्फ ‘अंग-व्यापार’ नहीं, बल्कि मौत का खेल खेलने की तलब उफान पर थी। उस रात जब पहली बार उसने एक टैक्सी ड्राइवर को ‘फर्जी ट्रिप’ पर बुलाया, तब वो सिर्फ पैसों के लिये नहीं, बल्कि ये परखने के लिये था कि वो मौत के धंधे का कितना बोझ उठा सकता है।
पहली हत्या: बलिया का भोलाराम
32 साल का भोलाराम टैक्सी ड्राइवर, जिसे जयपुर एयरपोर्ट से दिल्ली तक की एक लंबी सवारी का ऑफर मिला। घर में तीन छोटे बच्चे थे और बूढ़ी मां। पैसा अच्छा था, मौसम साफ। उसने सोचा, “भगवान की दया है… काम मिल रहा है।” लेकिन रास्ते में कहीं, धौलपुर के पास, रात का अंधेरा जब उतर चुका था, तभी उसके साथ सवारी बनकर बैठे देवेंद्र शर्मा और उसके दो साथियों ने उसे नींद की गोलियां मिली कोल्ड ड्रिंक पिलाई। जब गाड़ी रुकी, भोलाराम सांसें ले रहा था, लेकिन फिर तेज झटका और सब खत्म। भोलाराम की लाश को रात के सन्नाटे में हजारा नहर के किनारे लाया गया और फिर मगरमच्छों के हवाले कर दिया गया। “साफ-सुथरा काम है,” शर्मा ने अपने साथी विजय को कहा, “न पुलिस, न सबूत, न कफन।” गाड़ी अगले ही दिन अलवर के एक स्क्रैप डीलर को बेच दी गई।
भोलाराम की मां की पुकार
भोलाराम की मां शांति देवी, आज भी बलिया के एक छोटे से गांव में चौखट पर बैठती हैं। हर बार जब कोई सफेद गाड़ी गांव में आती है, उनकी आंखें चमकती हैं, फिर बुझ जाती हैं। “वो कह कर गया था, दो दिन में लौटूंगा… अब तो तेरह साल हो गये।” उन्होंने बेटे की तलाश में मंदिरों के चक्कर काटे, पुलिस थानों में चप्पल घिसीं, लेकिन जब 2010 में पता चला कि बेटे को हजारा नहर में मगरमच्छों को खिला दिया गया था, उनकी आंखों का पानी सूख गया।” काश वो मुझे मार देता, मेरे बेटे को छोड़ देता।” यही कहते-कहते वो चुप हो जाती हैं।
स्याह नकाब में कई चेहरे
- विजय शर्मा – हरियाणा का रहने वाला, पूर्व मैकेनिक। वाहनों को काटकर बेचने का विशेषज्ञ।
- नसीरुद्दीन – कासगंज का बिचौलिया। किडनी रैकेट में भी देवेंद्र का पुराना साथी था।
- बलदेव सिंह – पंजाब का ड्राइवर जो अब गिरोह में ‘ड्राइवरों को लाने’ वाला एजेंट बन चुका था।
- और फिर थे कुछ डॉक्टर, जो पहले किडनी रैकेट में थे और बाद में ‘लाश को ठिकाने लगाने’ की व्यवस्था में।
ये कोई चौराहा नहीं था, ये थी एक “मौत की फैक्ट्री”, जिसमें हर सदस्य अपनी भूमिका निभा रहा था, किसी को बहलाना, किसी को मारना, किसी को बेच देना।







