पत्नी पांव पकड़कर बोली- आब कहियों ना जाबे परदेश (VIDEO)

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Ranchi (Bhavna Thakur) : उस रात पत्नी फुलमतिया बिस्तर पर गई जरूर पर करवटे बदलती रही। मानो नींद भी रूठ गई थी। अचानक उसका मन घबराने लगा। बैचेनी महसूस होने लगी। पति कोसों दूर था। उसका ध्यान सीधे अपने पति पर गया। फिर बुदबुदाई हे भगवान सबकुछ ठीक तो है। बिस्तर छोड़ खिड़की से बाहर झांकने लगी। दिवाली को लेकर कुछ घरों में रंगबिरंगी लड़िया लटक रही थी। दिवाली के रोज पति का घर में न होना भी खल रहा था। ऐसा पहले उसके साथ कभी नहीं हुआ। सूरज निकल रहा था और वह धरती की तरह तपती जा रही थी। उस रोज बच्चों का शोर भी उसे अच्छा नहीं लगा। पति का मोबाइल आउट ऑफ रीच था। एक ही दम में कई बार फोन लगाई हर बार हर बाहर आपके द्वारा डाइल किया गया नंबर नेटवर्क कवरेज एरिया से बाहर बताया। उसकी बैचेनी बढ़ती चली गई। दिवाली के रोज भी झाड़ू पोछा करना भूल गई। किसी काम में कोई मन नहीं लग रहा था। कलेजा जोर-जोर से धक-धक करने लगा। वह फिर कहने लगी हे भगवान कोई अनहोनी तो नहीं होने वाली। अचानक उसके मोबाइल की घंटी बजी। झट से उठाया तो मनहूस खबर मिली। उसे बताया कि उसका पति 41 अन्य आदमियों की साथ सुरंग में घुसा था, फंस गया। सुरंग के अंदर बड़ा सा मलबा ढह गया। अब वहां से निकलने का कोई चारा नहीं। यह सुन फुलमतिया गश खाकर गिर गई। मानो उसे काठ मार गया हो। दिवाली के रोज आयी इस मनहूस खबर ने मोहल्ले के दीये को भी बुझा दिया।

चीख-चीत्कार सुन गांव की चाची आयी, बोली ए बहुरिया काहे रोती है। भगवान पर भरोसा रखो। वो आयेगा। फुलमतिया दिन रात कभी मोबाइल, कभी टीवी तो कभी लोगों से खबर लेती रही। जब कभी दुश्वारी की खबर मिलती तो दुख से घिर जाती। वहीं उम्मीद की खबर आती तो उसके मन को सुकून मिलता। कब दिन कब रात होता उसे पता ही नही चलता। यूं ही गुजर गये 17 रोज। भूख मर गई, सजना संवरना छोड़ दी। बस आते-जाते लोगों को रोकती-टोकती और पूछती उत्तरकाशी से कोई खबर आया बाबू। सुरंग में मेरा पति भी फंसा है। बीते 9 रोज से भूखा प्यासा अंदर फंसा है। उसे भूख बर्दाश्त नहीं। पर बहुत हिम्मत वाला है। बच्चों की पेट की खातिर घर बार छोड़ प्रदेश कमाने चला गया। उसने अब तक किसी का बुरा नहीं किया। मेहनत मजदूरी कर परिवार को पाल पोश रहा है। मेरा दिल कहता है सरकार सबको सही सलामत निकाल उनके घर तक पहुंचा देगी। आज फुलमतिया बेहद खुश है। घर और घर के बाहर दिवाली सा नजारा।

कुछ देर पहले ही प्रशासन की एक टीम ने उसके पति विजय और बाकियों को घर तक पहुंचाया। दिल्ली से हवाई जहाज से रांची तक आया। वहां जुटी भीड़ में कुछ के मुख से निकला भला हो सरकार का जिसने जी जान लगा कर सबको बचा लिया। घर में कदम रखते ही विजय ने अपने बच्चे को गोद में उठा लिया और उसे चूमता रहा। पति के आने के इंतेजार में घर के एक कोने में चुकूमुकु बैठी पत्नी उसे पहले टुक-टुक निहारती रही। उसके चेहरे और आँगन में खुशियां आ गई। जब विजय ने अपनी पत्नी को पुकारा तब वो बावड़ी सी पति का पैर पकड़ रोने लगी और बोली- अब कभी मत जईयों छोड़कर परदेश….

बीते 17 दिनों तक की दुखभरी गाथा खुद विजय की पत्नी और उसके पड़ोसी बातचीत में बयां कर गये। वहीं घर लौटे परदेसी विजय के कहा सुरंग में फंस जाने के बाद परिवार बहुत याद आया। बीवी बच्चों का चेहरा हमेशा नजरों के सामने घूरते रहता था। मन अकबक करते रहता था। डर भी लगता था। पर कभी हिम्मत नहीं खोये। उम्मीद भी थी कि कुछ बढ़िया होगा। जिंदा घर लौटेंगे। फंसे 41 लोग बिल्कुल परिवार की तरह 17 दिन गुजारे। विजय खूंटी के कर्रा थाना क्षेत्र के गुमडु का रहनेवाला है।

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