Garhwa(Nityanand Dubey) : गढ़वा में चैत्र नवरात्र के पावन अवसर पर शहर के नरगिर आश्रम में आयोजित ‘नवाह परायण सह रामकथा अमृत वर्षा’ के सातवें दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। इस अवसर पर अयोध्या से पधारे सुप्रसिद्ध कथावाचक पूज्य संत बालस्वामी ने प्रभु श्रीराम के वनवास, केवट प्रसंग और भरत के त्याग की मार्मिक व्याख्या की, जिसे सुनकर पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर हो गये। कथा के दौरान पूज्य बालस्वामी ने केवट प्रसंग का उल्लेख करते हुये कहा कि रामकथा वास्तव में समर्पण और सच्ची भक्ति की कथा है। उन्होंने बताया कि कैसे एक साधारण मल्लाह केवट ने अपनी चतुर भक्ति से स्वयं भगवान को भी भावुक कर दिया। उन्होंने प्रसंग सुनाते हुये कहा कि केवट ने प्रभु से विनम्रता से कहा, “आपके चरणों की धूल में नारी बनाने की शक्ति है, कहीं मेरी काठ की नाव भी नारी न बन जाये।” इसी बहाने उसने प्रभु के चरण पखारे और चरणामृत ग्रहण कर अपने जीवन को धन्य बना लिया। जब प्रभु श्रीराम ने उसे उतराई देने की बात कही, तो केवट ने कहा, “प्रभु, मैं तो इस पार उतारता हूं, आप मुझे भवसागर से पार उतार देना।” यह संवाद सुनकर पूरा पंडाल श्रद्धा और भक्ति से गूंज उठा। कथावाचक ने भरत के चरित्र का वर्णन करते हुये कहा कि भरत का जीवन निस्वार्थ प्रेम, त्याग और धर्मपरायणता का प्रतीक है। राजपाट मिलने के बावजूद उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया और 14 वर्षों तक तपस्वी वेश में रहकर प्रभु श्रीराम की चरण-पादुकाओं की सेवा की। उन्होंने कहा कि आज के समाज को भरत के जीवन से मर्यादा और त्याग की प्रेरणा लेनी चाहिये।
कथा में चित्रकूट की पावन महिमा का भी वर्णन किया गया। बताया गया कि मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित यह स्थल प्रभु श्रीराम के वनवास का प्रमुख साक्षी रहा है। यहां स्थित कामदगिरी पर्वत और गुप्त गोदावरी जैसे स्थल आज भी रामायण काल की स्मृतियों को जीवंत करते हैं। पूज्य बालस्वामी ने कहा कि रामायण का हर प्रसंग आज के जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक है। मनुष्य को हानि होने पर धैर्य नहीं खोना चाहिये और लाभ होने पर लोभ नहीं करना चाहिये। निष्काम भाव से की गई भक्ति ही ईश्वर तक पहुंचने का सच्चा मार्ग है। कार्यक्रम के अंत में रामकथा समिति के अध्यक्ष चन्दन जायसवाल ने श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त करते हुये कहा कि नगरवासियों के सहयोग से यह आयोजन लगातार पांचवीं बार सफलतापूर्वक संपन्न हो रहा है। उन्होंने कहा कि रामकथा की यही विशेषता है कि इसे जितनी बार सुना जाये, उतनी ही नई अनुभूति और आनंद मिलता है।
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