Kohramlive : सनातन परंपरा में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है, लेकिन जब बात निर्जला एकादशी की आती है तो इसका स्थान सबसे अलग और सर्वोच्च माना जाता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु विधि-विधान से निर्जला एकादशी का व्रत करता है, उसे वर्षभर की सभी एकादशियों के व्रत के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पड़ने वाली निर्जला एकादशी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। यही कारण है कि देशभर के श्रद्धालु इस दिन कठिन उपवास रखकर श्रीहरि की आराधना करते हैं। पंडित झा जी के अनुसार इस वर्ष 25 जून यानी गुरुवार को निर्जला एकादशी का व्रत किया जायेगा। इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें श्रद्धालु पूरे दिन बिना अन्न और बिना जल ग्रहण किये उपवास रखते हैं। अगले दिन द्वादशी तिथि पर स्नान, पूजा-पाठ और भगवान विष्णु की आराधना के बाद व्रत का पारण किया जाता है।
क्यों कहा जाता है इसे भीमसेनी एकादशी?
निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इसके पीछे महाभारत काल की एक रोचक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार पांडवों में भीमसेन को भोजन अत्यंत प्रिय था। अन्य पांडव और माता कुंती सभी एकादशी का व्रत रखते थे, लेकिन भीम के लिये भूखे रहना कठिन था। एक दिन उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ऐसा उपाय पूछा जिससे उन्हें भी सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त हो सके। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किये व्रत रखने की सलाह दी। भीम ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुये कठिन निर्जला व्रत किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें सभी एकादशियों के व्रत का फल प्रदान किया। तभी से यह तिथि भीमसेनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गई।
दान-पुण्य का विशेष महत्व
धार्मिक ग्रंथों में निर्जला एकादशी पर दान-पुण्य को अत्यंत फलदायी बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन किये गये दान का अक्षय फल प्राप्त होता है। विशेष रूप से जल से भरे घड़े, मीठा पानी, फल, पंखे, वस्त्र, अन्न और धन का दान शुभ माना जाता है। भीषण गर्मी के मौसम में प्यासे लोगों को पानी पिलाना भी महापुण्यकारी कार्य माना गया है।
व्रत से मिलती है मोक्ष की प्राप्ति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत मनुष्य को जीवन-मरण के बंधन से मुक्त कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। कहा जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया यह व्रत समस्त पापों का नाश करता है और व्रती को चारों पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। निर्जला एकादशी केवल एक उपवास नहीं, बल्कि आत्मसंयम, श्रद्धा और भगवान विष्णु के प्रति समर्पण का महापर्व है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से श्रीहरि का स्मरण करने वाले भक्त पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा बरसती है और उसके जीवन में सुख, शांति एवं समृद्धि का वास होता है।
(नोट : व्रत एवं पूजा-पद्धति से जुड़ी जानकारी धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषाचार्यों के कथनों पर आधारित है।)
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