Ranchi : नहाय-खाय के साथ महापर्व छठ आज से शुरू हो गया। व्रत रखने वाले लोगों ने पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ शुद्धता का ख्याल रखते हुये आम के दातुन से मुंह धोया। फिर स्नान कर पूजा अर्चना की। वहीं कद्दू की सब्जी, चने का दाल और चावल बनाया। पहले वत्रियों ने कद्दू-भात खाया, इसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों ने इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। महापर्व छठ में प्रकृति को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है। इसमें डूबते सूरज और उगते सूरज को अर्ध्य दिया जाता है। इसमें जितना सूर्य का महत्व है, उतना ही जल का।व्रती तालाब या नदी में खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इसमें शामिल होने वाला प्रसाद भी पूरी तरह से प्रकृति द्वारा उपजाए गए पदार्थ से बनाये जाते है, जो छठी मईया को अति प्रित होते हैं. इस त्यौहार में नये अनाज, नया गुड़, नया चावल, नया गेहूं, गाय का घी, मौसमी फल, हरे बांस के बनाये हुए सूप से अर्घ्य दिया जाता है। यह एकमात्र पहला महापर्व है, जिसमें किसी पुरोहित यानी पुजारी की जरूरत नहीं होती है। परिवार के लोग ही व्रती को अर्घ्य दिलाते हैं। गाय के दूध और गंगाजल से अर्घ्य दिलाया जाता है।
18 नवम्बर को खरना
18 नवंबर को खरना है। पूरे विधि-विधान से पूरे दिन उपवास में रहकर खरना करते हैं। शाम को व्रती खुद से नये चावल, नया गुड़ और दूध से खीर बनाती हैं। इसके साथ नये गेहूं के आटे की रोटी तैयार की जाती है। व्रती शाम में खीर, फल, रोटी का भोग छठी मईया को लगाती हैं। इसमें केले के पत्ते का उपयोग किया जाता है। जब व्रती प्रसाद ग्रहण कर लेती हैं, उसके बाद बाकी नाते-रिश्तेदार और संगे-संबंधी प्रसाद ग्रहण करते हैं। लोग बहुत श्रद्धा और आस्था के साथ खरना का प्रसाद खीर और रोटी ग्रहण करते हैं। इसके साथ ही व्रती का 36 घंटे का उपवास शुरू हो जाता है।
19 नवम्बर को पहला अर्ध्य
19 नवंबर को छठ का पहला अर्घ्य शाम को है। इस रोज गुड़-आटे को मिला कर घी में तलकर ठेकुआ तैयार किया जाता है। वहीं, चावल और गुड़ का लड्डू भी बनाया जाता है। शाम के समय मौसमी फल, जिसमें नारियल, केला, नारंगी, सेव, बड़ा नींबू, जैसे अलग-अलग तरह के फलों को लेकर बांस के सूप को सजाया जाता है। अब पीतल और चांदी के सूप का भी इस्तेमाल होने लगा है। मन्नत के अनुसार सूप का इस्तेमाल किया जाता है। व्रती शाम के समय तालाब, सरोवर, नदी, या फिर छत पर खुद से बनाये हुये टब में पानी डालकर स्नान करने के बाद डूबते हुये सूर्य को अर्घ्य देती है। इस दरम्यान छठी मईया का पूजन किया जाता है। मन्नत के मुताबिक कुछ व्रती कोसी पूजा भी करती हैं, जिसमें गन्ने का मंडप बनाकर पूरी रात जाकर दीया जलाकर पूजा किया जाता है।
20 नवम्बर को लोक आस्था महापर्व का आखिरी दिन
चौथे दिन यानी 20 नवम्बर को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही लोक आस्था के महापर्व छठ का आखिरी दिन है। इस रोज उगते हुये सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। शाम की तरह ही पूरे सूप को एक बार फिर से नये फलों से सजाकर, नये प्रसाद रखकर अर्घ्य दिया जाता है। भगवान भास्कर की आराधना की जाती है। हवन और मंदिर में माथा टेकने के बाद व्रती प्रसाद लेकर व्रत का समापन करती हैं। इसके बाद लोक आस्था के महापर्व छठ का प्रसाद बांटा जाता है।
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