Ranchi : राजधानी रांची की धूप कुछ ज्यादा तप रही है इन दिनों, पर उससे भी ज्यादा तप रहा है उन माता-पिताओं का दिल, जो बच्चों के भविष्य को चमकाने की ख्वाहिश में, निजी स्कूलों की दहलीज पर हर महीने अपनी कमाई की आखिरी सांसें छोड़ते हैं। बात सिर्फ किताबों और ट्यूशन की नहीं रही अब, अब स्कूल की फीस में ‘डेवलपमेंट’ का एक अलग ही मंजर है, बिल्डिंग फंड, जो शायद कभी उनकी जेब में इमारत बन जाता है, एनुअल डे, जिसे मनाने की कीमत साल भर की कमाई हो जाती है, लेट फाइन, मानो मां-बाप जुर्म कर बैठे हों समय पर पैसे न दे पाने का।
झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय राय की आवाज में आज वो कंपकंपी है, जो तब आती है जब न्याय की दीवारें चुप रहती हैं। उन्होंने कड़े लहजे में कहा, “यह केवल अधिनियमों का उल्लंघन नहीं है, यह भरोसे की हत्या है।” राज्य का शिक्षा न्यायाधिकरण अधिनियम 2017 किताबों में जरूर है, मगर जमीनी हकीकत में गुम है। शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन के सार्वजनिक मंचों पर बोले गये वाक्य अब रिकोर्डिंग में तो हैं, मगर रियायत में नहीं। कोरोना की मार से टूटा आम इंसान आज भी संभल नहीं पाया, महंगाई की आंधी में बिखरीं उनकी उम्मीदें अब स्कूलों के फीस-सुनामी में डूब रही हैं। अजय राय ने चेतावनी दी है कि “अगर अब भी कुछ नहीं बदला, तो सड़कों पर माताओं की ममता और पिताओं की बेबसी उतर आयेगी, झारखंड को हिला देने वाली एकजुट आवाज बनकर।” अब समय है कि सरकार जागे, हर बच्चा, हर मां-बाप, सिर्फ पढ़ाई की चिंता करे, कमाई की नहीं।
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