Garhwa(Nityanand Dubey) : गढ़वा से रांची की ओर दौड़ती बस “राजा साहब” अपने सफर पर थी, मुसाफिरों के चेहरे पर मंज़िल तक पहुंचने की आस थी, हरेक यात्री इस बात से अनजान था कि यही सफर अचानक सांसें रोक देने वाला बन जायेगा। सुबह 9.10 बजे, रंका मोड़ से खुली बस अपनी पूरी रफ्तार में थी, करीब 80 किमी/घंटा। तहले नदी का पुल पार कर ही रही थी कि अचानक स्टेयरिंग थामे वीरेंद्र पांडेय के चेहरे पर शिकन उभरी, हाथ कांपा, और अगले ही पल वह सीट पर लुढ़क गया। बस में सवार 50-60 यात्रियों की धड़कनें थम गईं। किसी को कुछ समझ नहीं आया कि यह हो क्या रहा है। बस दौड़ रही थी, मगर उसका सारथी बेसुध पड़ा था।
सूझबूझ बनी जिंदगी की डोर
ऐसे में गढ़वा प्रखंड के झूरा गांव निवासी मनीष तिवारी ने सूझबूझ दिखाई। उन्होंने तुरंत डॉक्टर निशांत सिंह से संपर्क किया। डॉक्टर की सलाह पर कुछ यात्रियों ने ड्राइवर को बचाने की कोशिश शुरू कर दी, किसी ने उसे मुंह से सांसें दीं, तो किसी ने CPR देकर उसकी दिल की धड़कनों को फिर से जगाने की कोशिश की। इस बीच, मनीष के भाई अमित तिवारी अपनी कार लेकर मौके पर पहुंचे और ड्राइवर को लेकर फौरन मेदिनीनगर के नारायण सुपर स्पेशलिटी अस्पताल पहुंच गये। अस्पताल में डॉक्टर सचिन बोले, ”बस कुछ सेकंड और देर होती तो जान नहीं बचती। ड्राइवर को हार्ट अटैक आया था। अगर CPR न दिया जाता, तो उसकी जान नहीं बचती।” गढ़वा के डॉक्टर निशांत सिंह ने भी यात्रियों की तत्परता की सराहना करते हुये कहा, “समय पर CPR देना किसी चमत्कार से कम नहीं था।” इस बीच, बस के बाकी यात्री दूसरी बस से रांची रवाना हो गये, मगर पीछे छोड़ गये एक ऐसी कहानी, जो इंसानियत और हौंसले की मिसाल बन गई।
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