Bokaro : बोकारो पुलिस की कार्यशैली से रंजय कुमार वर्मा को गहरा झटका लगा है। सहसा उन्हें यकीन नहीं कि पुलिस ऐसा भी कर सकती है। एक थानेदार से उन्हें तीखी चोट मिली, वहीं दूसरे थानेदार ने उन्हें मरहम लगाया। रंजय वर्मा की होंडा सिविक कार (WB06F 5566) बीते 31 मई की देर रात चोरी हो गयी थी। यह कार उनके बेटे ओम ने अपने दोस्त के घर कर बाहर लगा रखी थी। उस रात ओम अपने दोस्त के ही घर में ठहरा था। दूसरे दिन ओम को अपने पिता रंजय के साथ कार से बिहार के गया निकलना था।
अगले दिन यानि एक जून को उनके बेटे ने देखा कि कार गायब है। इस बात की जानकारी उसी रोज ओम प्रकाश द्वारा बोकारो के बालीडीह थाना में दी गयी। ओम ने FIR दर्ज करने के लिए लिखित आवेदन दिया। रिसीविंग कॉपी में 5 जून की तिथि अंकित है। इस बीच कई महीने गुजर गए, पर चोरी की गयी कार का कुछ पता नहीं चला। इस बीच कार के मालिक रंजय कुमार वर्मा ने कार को अपने स्तर से खोजना शुरू किया। खोजते-खोजते वह अपनी कार का पता कर लिए। उन्हें पता चला कि उनकी कार खगड़िया में बेच दी गयी है। यह कार पुरानी-नई कार खरीदने वाले एक एजेंसी ने ली है।
यह जानकारी जुटाते ही रंजन वर्मा ने बालीडीह के थानेदार को सबकुछ बताया। उन्हें केस देख रहे नीतीश कुमार से बात करने को कहा गया। तब उन्होंने उनसे संपर्क कर FIR नंबर मांगा और साथ में खगड़िया चलने का आग्रह किया। पुलिस वाले टाल-मटोल करते रहे। इस तरह 5 महीने गुजर गए। रेलवे कर्मी रंजय वर्मा छुट्टी लेकर बांकुड़ा से बोकारो आये। वह भागे-भागे बालीडीह थाना पहुंचे। थानेदार बदल चुके थे। नए थानेदार रामप्रवेश ने जब थाने का रजिस्टर खंगाला तो चौंकाने वाली बातें सामने आयी। खुलासा हुआ कि कार चोरी का FIR दर्ज किया ही नहीं गया है। केवल सनहा दर्ज किया गया है।
रंजय वर्मा को जोर का झटका धीरे से लगा। उन्होंने कहा कि अगर उनके पास FIR नंबर होता तो वह खुद खगड़िया जाते और वहां की लोकल पुलिस की मदद लेकर अपनी कार ले आते। रंजय वर्मा ने बताया कि पुराने थानेदार की हरकत और कार्यशैली के बारे में बोकारो पुलिस कप्तान को सबकुछ बताया। उन्हें फिर नए सिरे से थाने में नया आवेदन देने को कहा गया। वहीं बालिडीह के वर्तमान थानेदार रामप्रवेश ने इसे गंभीरता से लिया और FIR अंकित किया। वहीं रंजय वर्मा को भरोसा दिलाया गया है कि उनकी चोरी गयी कर को बहुत जल्द खोज निकाला जायेगा। रेलवे कर्मचारी रंजय ने कहा कि वह बोकारो पुलिस की कार्यशैली से बहुत दुखी और आहत है। वह पहले जब कभी FIR नंबर मांगा करते थे तो उन्हें टाल दिया जाता था। अब समझ आया कि पुलिस ऐसा क्यों करती थी। रंजय ने बताया कि उन्होंने यह कार धनबाद के एक शख्स से कुछ दिन पहले ही खरीदी थी। अभी नाम तक ट्रांसफर नहीं हुआ है।
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