डिजिटल कंटेंट बना रही कुंवारी मां, 3 साल में 2,320 केस…

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Kohramlive : कर्नाटक में नाबालिग लड़कियों के गर्भवती होने के मामलों में लगातार इजाफा दर्ज किया जा रहा है, जिसने सरकार और समाज दोनों की चिंता बढ़ा दी है। महिला एवं बाल कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, बीते तीन वर्षों में 2,320 नाबालिग गर्भावस्था के मामले सामने आये हैं, वहीं, वर्ष 2025 में अक्टूबर के अंत तक ही 749 मामले दर्ज किये जा चुके हैं। विभागीय रिपोर्ट के मुताबिक, ये मामले राज्य के कई हिस्सों में फैले हुये हैं। बेंगलुरु, मैसूर, चित्रदुर्ग, गडग, कोलार सहित बेंगलुरु क्षेत्र में ही कुल 729 मामले सामने आये हैं। आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी गंभीर रूप ले रही है।

डिजिटल कंटेंट बना कारण

महिला एवं बाल कल्याण विभाग का कहना है कि नाबालिग गर्भावस्था के मामलों में वृद्धि के पीछे प्रेम संबंध, कानून की अपर्याप्त जानकारी और सामाजिक परिस्थितियां प्रमुख कारण हैं। वहीं, मोबाइल फोन पर उपलब्ध पोर्नोग्राफिक कंटेंट, वेब सीरीज और यौन उत्तेजक सामग्री का भी नाबालिगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। कम उम्र में रिश्तों की ओर आकर्षण बढ़ने से कई मामलों में युवक इसका गलत फायदा उठाते हैं। कई मामलों में आरोपियों के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत केस दर्ज किये जाते हैं, लेकिन सबूतों की कमी और पीड़ित परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर आशंकाओं के चलते शुरुआती स्तर पर ही समझौता या बीच-बचाव की कोशिशें सामने आती हैं। इसका सीधा असर यह पड़ता है कि आरोपियों को सजा दिलाने में कठिनाई होती है।

हाल की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

हाल के दिनों में सामने आई घटनाओं ने स्थिति की गंभीरता और बढ़ा दी है।यादगीर जिले के शाहपुर तालुक स्थित एक रेजिडेंशियल स्कूल में कक्षा 9 की छात्रा ने हॉस्टल के शौचालय में बच्चे को जन्म दिया। वहीं शिवमोग्गा में 15 साल की लड़की द्वारा घर के टॉयलेट में बच्चे को जन्म देने का मामला सामने आया, जिसमें आरोपी परिवार का सदस्य बताया गया है। राज्य सरकार ने इस सामाजिक चुनौती से निपटने के लिये चाइल्ड मैरिज प्रोहिबिशन एक्ट–2006 में संशोधन किया है। इसके अलावा चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 को सक्रिय रखा गया है और जिला व तालुका स्तर के अधिकारियों को प्रशिक्षण देकर जागरूकता और त्वरित कार्रवाई पर जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि कानूनी सख्ती के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता, स्कूल स्तर पर यौन शिक्षा और डिजिटल कंटेंट पर निगरानी ही इस बढ़ती समस्या पर प्रभावी अंकुश लगा सकती है।

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