रांची (सत्य शरण मिश्र/संजय कपरदार) : दूसरे का सुख-दुख हरने और आंसू पोंछने वाली महिला दारोगा दुर्गा के बहते आंसू को पोंछने वाला कोई नहीं। दिन की शुरुआत होती है झर-झर गिरते आंसुओं से और कब बीत जाती है रात पता ही नहीं चलता। नींद भी उड़ गई है। आंखें बंद करते ही उसे अपना 12 साल का मासूम बच्चा पार्थिव नजर आता है। जो काल के गाल में समा गया था न्यूक्लियस मॉल के एस्केलेटर में। उस तारीख से दुर्गा हर किसी से यही पूछ रही है कि कौन है उसके बेटे की मौत का गुनहगार। आज तक उसे किसी ने कुछ नहीं बताया। उसने अपनी सारी ताकत झोंक दी पर सिस्टम सब कुछ जानते हुए भी अनजान है और इससे संबंधित फाइल दफन है। अब तो आलम ये है कि दुर्गा पूछती है कुछ, जवाब मिलता है कुछ। ताकि वो थक हार कर खामोश हो जाए।
नेवी से रिटायर्ड पार्थिव के पिता अपने बेटे की मौत के जिम्मेदार को सजा दिलाने के लिए हर दरवाजा खटखटा कर थक चुके हैं। कहते हैं गुनहगार इतना ताकतवर है कि हर कोई उसके सामने नतमस्तक है। कोई जिये, कोई मरे शासन प्रशासन को कोई मतलब नहीं है। डेढ़ साल में पुलिस ने अबतक मामले की चार्जशीट फाइल नहीं की है।
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