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जेल के अंदर ”इनका” चलता है राज, बस जेब में नोट होने चाहिये…

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Ranchi(Neeraj Thakur) : बाहर से देखने पर जेल की ऊंची-ऊंची दीवारें यह भरोसा दिलाती हैं कि इनके भीतर कानून का राज होगा। लोहे की सलाखें, बंद फाटक और पहरेदारों की सख्त निगरानी देखकर लगता है कि यहां हर कैदी एक जैसा जीवन जीता होगा। लेकिन हकीकत कई बार इन दीवारों से भी ज्यादा ऊंची और चौंकाने वाली होती है। कहते हैं, “अगर जेब में नोट हैं, तो जेल भी होटल बन जाता है।” यह सिर्फ कहावत नहीं, बल्कि उन लोगों का दावा है, जिन्होंने जेल के भीतर की दुनिया को करीब से देखा है और अंदर-बाहर होते रहते हैं। वहां नियमों की अपनी किताब है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा असर उस “अनकही व्यवस्था” का है, जिसमें हर सुविधा की एक कीमत तय होती है।

मोबाइल चाहिये, कीमत दीजिये, इंतजाम हो जायेगा

जेल के भीतर मोबाइल रखना कानूनन अपराध है। लेकिन चर्चा यह है कि अगर जेब भारी हो, तो यह नियम भी हल्के पड़ जाते है। कुछ दिन पहले ही जेल से छूट कर बाहर आये एक दागी का दावा है कि साधारण की-पैड मोबाइल रखने के लिये हर महीने करीब 10 हजार रुपये, जबकि एंड्रॉयड मोबाइल के लिये 20 से 25 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। कीमत चुकाइये और दुनिया आपकी मुठ्ठी में। खबर है कि जेल में बंद एक सरगना अपने पास तीन मोबाइल रखता है। बदले में वो महीना 1 लाख रुपये खर्च करता है। यही नहीं, जब कभी जेल में अचानक छापेमारी की आहट मिलती है, तब भी कुछ लोग बेफिक्र रहते हैं। आरोप तो यहां तक लगते हैं कि कुछ जेलकर्मी ही मोबाइल छिपाने की जिम्मेदारी उठा लेते हैं, ताकि जांच खत्म होने के बाद फिर वही मोबाइल कैदी तक पहुंच जाये। एक दागी का दावा है कि अगर छापामारी के समय जेल में तैनात कर्मियों की तलाशी ली जाये तो कई चौंकाने वाले राज खुलकर सामने आ जायेंगे। गांजा की पुड़िया से लेकर खैनी के डिब्बे तक यह राज उगल जायेंगे यह डिब्बा किसका। मोबाइल में लगे सिम ज्यादातर लड़कियों के नाम के होते हैं, ताकि पकड़े जाने पर जांच भी धीमी हो जाये।

मनपसंद वार्ड भी, मनपसंद खाना भी

जेल में कौन किस वार्ड में रहेगा, यह केवल प्रशासनिक फैसला हो, ऐसा हर जगह नहीं माना जाता। चर्चा यह है कि कई वार्डों में प्रभावशाली कैदियों या गैंगस्टरों की ऐसी पकड़ होती है कि किसे अपने वार्ड में रखना है और किसे नहीं, इसका फैसला भी उनकी मर्जी से होता है। अगर रसूख और रुपया दोनों साथ हों, तो मनपसंद वार्ड, बेहतर खाना, अतिरिक्त सुविधायें और आराम की व्यवस्था भी मुश्किल नहीं रह जाती। जेल जाने वाले मुजरिम से भी कभी-कभी यह पूछा जाता है कि तुम किस बॉस के वार्ड में जाना पसंद करोगे। जात-पात का भी वहां ख्याल रखा जाता है।

गैंगस्टर जेल में, लेकिन हुकूमत बाहर तक

जेल का मतलब अपराध का अंत होना चाहिये, लेकिन कई मामलों में आरोप लगते रहे हैं कि जेल कुछ गैंगस्टरों के लिये ऑपरेशन सेंटर बन जाती है। कहा जाता है कि सलाखों के पीछे बैठा अपराधी मोबाइल के जरिये बाहर अपने नेटवर्क को निर्देश देता है। रंगदारी से लेकर धमकी, जमीन विवाद से लेकर हत्या की साजिश तक, कई मामलों की डोर जेल की बैरकों से जुड़ने की बातें समय-समय पर सामने आती रही हैं। एक पुलिस अधिकारी ने कभी अनौपचारिक बातचीत में कहा था, “जेल से फेंकी गई एक गुगली, बाहर कई विकेट गिरा देती है।” जेल में पहुंचने वाली खाद्य सामग्री को लेकर भी अक्सर सवाल उठते रहे हैं। चर्चा है कि सब्जियों और राशन की टोकरियों के बीच छिपाकर गांजा, खैनी और दूसरे प्रतिबंधित सामान भी अंदर पहुंचा दिये जाते हैं। जरूरत सिर्फ खरीददार की होती है। पैसा दीजिये और सामान आपकी बैरक तक। एक बार तो यह भी राज बेनकाब हो चुका है कि इसी सब्जियों की टोकरी से उम्दा किस्म के हथियार तक जेल के अंदर पहुंच गये। इस संबंध में रांची के सदर थाने मेंं FIR तक दर्ज है। यानी जिस जगह सुधार होना चाहिये, वहां भी कई बार अवैध कारोबार का अपना रास्ता निकल आता है।

छोटे कैदी बन जाते हैं ‘सेवक’

जेल के भीतर भी एक अलग सामाजिक ढांचा बन जाता है। आरोप हैं कि प्रभावशाली कैदियों के सामने छोटे या कमजोर कैदियों से कपड़े धुलवाने, पैर दबवाने, देह मालिश कराने और निजी काम करवाने जैसे वाक्या सामने आते रहते हैं। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव जब जेल गये थे तब उनके दो निजी सेवक पहले ही जेल पहुंच गये थे। इन दोनों सेवकों को जेल भेजने में तब एक पुलिस अधिकारी की भूमिका सामने आई थी। विरोध करने की हिम्मत हर किसी में नहीं होती। सबसे ज्यादा परेशानी उन परिवारों की होती है, जो अपने किसी परिजन से मिलने जेल पहुंचते हैं। मुलाकाती बताते हैं कि जेल के मुख्य गेट से लेकर मुलाकात कक्ष तक कई बार उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ता है। आरोप यह भी हैं कि अलग-अलग स्तर पर सुविधा के नाम पर अवैध वसूली की शिकायतें सुनने को मिलती हैं। किस कैदी से कितनी देर मुलाकात होगी, यह भी कई बार उसके प्रभाव और हैसियत पर निर्भर करता दिखाई देता है।

सब जानते हैं, लेकिन बोलता कौन है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर यह सब होता है, तो जिम्मेदार एजेंसियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं होती? पूर्व जेल अधिकारियों और पुलिस से जुड़े कई लोगों का मानना है कि जेल के भीतर होने वाली हर गतिविधि से प्रशासन पूरी तरह अनजान हो, ऐसा मानना मुश्किल है। कई बार शिकायतें भी पहुंचती हैं, लेकिन कार्रवाई कितनी प्रभावी होती है, यह अलग सवाल है। जेल का मकसद अपराधियों को सजा देने के साथ-साथ उनका सुधार करना है। लेकिन यदि जेल के भीतर ही पैसे, रसूख और बाहुबल का समानांतर तंत्र खड़ा हो जाये, तो सबसे बड़ा सवाल व्यवस्था पर खड़ा होता है। जब जेल के भीतर भी सुविधाओं की कीमत तय होने लगे, जब मोबाइल, नशा और गैंग का नेटवर्क सलाखों को भी बौना बना दे, तब चिंता सिर्फ जेल प्रशासन की नहीं, बल्कि पूरे कानून-व्यवस्था तंत्र की हो जाती है।

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