Kohramlive : 22 अप्रैल की वो काली सुबह, कश्मीर की वादियों में सूरज उगा जरूर था, मगर बैसरन घाटी में अंधेरा ही उतर आया था। पुणे के दो परिवार, पहली बार कश्मीर की वादियों को देखने निकले थे। उन्हें क्या मालूम था कि उनका आखिरी सफर बन जायेगा। संगीता गणबोटे की आंखें अब सूखी हैं, लेकिन जो उन्होंने देखा, वो किसी को भी सुला नहीं सकता। “जब आतंकियों ने कौस्तुभ से पूछा कि अज़ान पढ़ सकते हो?” — संगीता बताती हैं, “हमने फौरन माथे की बिंदी मिटा दी, दुपट्टा सिर पर खींच लिया और अल्लाहु अकबर कहना शुरू किया… शायद जान बच जाये।” पर नहीं… कौस्तुभ और उनके बचपन के दोस्त संतोष जगदाले, दोनों को आंख, सिर और छाती में गोली मारी गई। संगीता का पति कौस्तुभ अब नहीं रहा, और संतोष की बेटी असावरी पिता की तस्वीरें निहारती रह गई। संतोष की पत्नी प्रतिभा जगदाले कहती हैं,”हम चिल्ला भी नहीं सकते थे, चारों ओर बंदूकें थीं। बच्चे रो रहे थे और हम बस मिट्टी में गिरते चले गये।” उन्हें ये तक नहीं बताया गया कि उनके पति जिंदा हैं या मर चुके। रात 10 बजे तक बस इंतज़ार और उम्मीद थी, फिर ख़बर आई — “वो अब नहीं रहे।” प्रतिभा कहती है “पर्यटन को बंद कीजिये साहब, जब तक वादी में मौतों का बाजार सजता है।”
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