Ranchi : झारखंड की जानी-मानी समाजसेविका Rani Kumari ने कहा कि तीन दशक से पलता एक सपना, हर चुनाव में गूंजता एक वादा, लेकिन जब उसे हकीकत बनने का वक्त आया, तो सियासत की दीवारें फिर आड़े आ गईं।महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर उम्मीद और हकीकत के बीच झूलता नजर आ रहा है।
Rani Kumari बोली बहुमत का सफर अधूरा
लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक दो-तिहाई बहुमत के अभाव में पारित नहीं हो सका। नतीजा, आधी आबादी का सपना फिलहाल अधूरा रह गया। करीब तीन दशक पहले शुरू हुई यह बहस हर दल ने समर्थन तो किया, लेकिन जब निर्णायक घड़ी आई तो मामला बार-बार ठंडे बस्ते में चला गया। साल 2023 में सभी दलों की सहमति से महिला आरक्षण का रास्ता खुला था। तय हुआ कि 2029 के आम चुनाव से 33% आरक्षण लागू होगा। लेकिन शर्तें और सियासी मतभेद अब फिर रास्ता रोकते दिख रहे हैं।
जनगणना और परिसीमन का पेंच
सरकार का तर्क है कि नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही आरक्षणलागू होगा। वहीं समाधान के तौर पर लोकसभा सीटों में 50% बढ़ोतरी का प्रस्ताव भी रखा गया, लेकिन विपक्ष को यह फार्मूला रास नहीं आया।विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण में अलग-अलग वर्गों के लिये कोटा जरूरी है, बिना सामाजिक संतुलन के आरक्षण अधूरा है। यह मांग जायज मानी जा रही है, लेकिन समय रहते यह बात पहले क्यों नहीं उठी—यह भी बड़ा सवाल है। रानी कुमारी ने कहा कि सत्ता पक्ष को झटका जरूर लगा है।
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लेकिन उसे विपक्ष पर आरोप लगाने का मौका भी मिल गया। वहीं विपक्ष इसे अपनी रणनीतिक जीत मान रहा है। इस सियासी खींचतान में नुकसान सिर्फ और सिर्फ महिलाओं का हुआ। जो आज भी संसद में बराबरी की आवाज के लिये एवं फैसलों में अपनी हिस्सेदारी के लिये इंतजार में हैं।












