Delhi : दिल्ली के सत्ता गलियारों में एक नया इतिहास लिखा गया। NDA के उम्मीदवार और महाराष्ट्र के राज्यपाल सी.पी. राधाकृष्णन ने उपराष्ट्रपति पद का चुनाव जीत लिया। 452 वोट उनके पक्ष में पड़े, वहीं, विपक्षी उम्मीदवार बी. सुदर्शन रेड्डी 300 वोटों पर ही सिमट गये। सियासत के पन्नों पर यह सिर्फ जीत नहीं, बल्कि चार दशकों की तपस्या, संगठन और संघर्ष की कहानी है।
बचपन और शिक्षा
4 मई 1957 तमिलनाडु के तिरुपुर जिले का एक साधारण घर। यहीं जन्मे सी.पी. राधाकृष्णन ने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक किया। उनका राजनीतिक सफर RSS से शुरू हुआ। 1974 में वे जनसंघ की राज्य कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने। ओबीसी समुदाय कोंगु वेल्लार (गाउंडर) से आने वाले राधाकृष्णन ने हमेशा जमीन से जुड़े मुद्दों को अपनी आवाज दी। 1996 में तमिलनाडु भाजपा के सचिव बने। 1998 में कोयंबटूर से पहली बार लोकसभा पहुंचे। 1999 में दोबारा जीत हासिल की। संसद में उन्होंने टेक्सटाइल समिति की कमान संभाली, वित्त और शेयर बाजार घोटाले की जांच समिति का हिस्सा रहे। 2004 में वे भारतीय संसदीय दल के सदस्य के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने भी गये। ताइवान जाने वाले पहले संसदीय प्रतिनिधिमंडल में भी शामिल रहे।
आंदोलन और नेतृत्व
2004 से 2007 तक वे भाजपा तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष रहे। इस दौरान उन्होंने 93 दिनों की 19,000 किलोमीटर लंबी रथयात्रा निकाली। नदियों को जोड़ने से लेकर आतंकवाद मिटाने, समान नागरिक संहिता से लेकर छुआछूत खत्म करने तक, इस यात्रा ने उन्हें जनता के दिल में जगह दिलाई। उन्होंने दो ऐतिहासिक पदयात्राएं भी कीं। 2016 से 2020 तक कोचीन स्थित कोयर बोर्ड के अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्व में निर्यात 2532 करोड़ रुपये तक पहुंचा। 2020 से 2022 तक वे भाजपा के ऑल इंडिया प्रभारी बने और केरल की कमान संभाली। इसके बाद उन्हें झारखंड और फिर महाराष्ट्र का राज्यपाल बनाया गया।
उपराष्ट्रपति तक की यात्रा
कल का यह दिन तमिलनाडु के उस बेटे के नाम रहा, जिसने संघ की शाखा से निकले संस्कारों को संसद तक पहुंचाया और अब उपराष्ट्रपति भवन तक का सफर तय किया। यह जीत सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस विचार की है जो संगठन, समर्पण और सेवा को राजनीति का मूल मंत्र मानती है।








