Kohramlive : भारत को गांवों का देश कहा जाता है। कहीं खेतों में लहलहाती फसलें दिखती हैं, कहीं सुबह होते ही पशुओं की घंटियां सुनाई देती हैं तो कहीं छोटे-छोटे कारोबार से गांव की जिंदगी चलती है। लेकिन हिमाचल प्रदेश की ऊंची पहाड़ियों में एक ऐसा गांव भी है, जहां पहुंचकर शायद आपको पहली नजर में यकीन ही न हो कि यह पूरा का पूरा गांव है। यहां न बड़ी आबादी है, न घरों की लंबी कतार, यहां केवल 6 लोग और एक घर है। यह अनोखा गांव है काकती, जो स्पीति घाटी की ऊंची पहाड़ियों में बसा हुआ है। कम आबादी और पीढ़ियों से चली आ रही अपनी खास जीवनशैली के कारण यह गांव चर्चा में रहता है। काकती की कहानी जितनी छोटी लगती है, उतनी ही दिलचस्प है। गांव में करीब 100 साल पुराना मिट्टी का घर बताया जाता है, जिसमें एक ही परिवार की कई पीढ़ियां रहती आई हैं। परिवार की जड़ें इसी गांव की मिट्टी से जुड़ी हैं और आज भी उनकी जिंदगी पुश्तैनी जमीन और घर के इर्द-गिर्द घूमती है। परिवार के दो भाइयों में से छोटे भाई कलजंग टाकपा लामा पारिवारिक परंपरा के मुताबिक बौद्ध भिक्षु बने और काजा स्थित एक बौद्ध गोंपा में सेवाएं देते हैं। वहीं उनके बड़े भाई छेरिंग नामगयल अपनी पत्नी रिंगजिन यूडन के साथ गांव में रहते हैं। परिवार की अगली पीढ़ी भी इसी परंपरा से जुड़ी हुई है। छेरिंग के बड़े बेटे सोनम छोपेल भी लामा हैं और चौंतड़ा बौद्ध मंदिर में शिक्षा ले रहे हैं। उनका दूसरा बेटा नवांग ज्ञालसन विशेष जरूरतों वाला बच्चा है, जबकि तीसरा बेटा नवांग कुंगा टैक्सी चलाते हैं।
करीब 15 बीघा जमीन और पहाड़ों जैसी सादगी
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह परिवार अपनी पांचवीं पीढ़ी में है। परिवार के पास पुश्तैनी घर के साथ करीब 15 बीघा जमीन भी है। इसी जमीन पर खेती कर परिवार अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करता है। न शहर का शोर, न बाजार की भागदौड़, न भीड़ का दबाव। बस पहाड़, मिट्टी का घर और अपनी मेहनत से चलती जिंदगी। शायद यही वजह है कि काकती की कहानी सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि बदलते दौर के बीच बची हुई एक बेहद सादगी भरी दुनिया की तस्वीर लगती है।
300 साल पुराना ‘मड हाउस’ है गांव की पहचान
काकती की सबसे खास पहचान यहां मौजूद करीब 300 साल पुराना पारंपरिक मड हाउस भी बताया जाता है। मिट्टी और पत्थरों से बना यह पारंपरिक घर सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि परिवार की पीढ़ियों पुरानी विरासत है। हिमालयी इलाकों में पुराने समय में ऐसे घरों का निर्माण स्थानीय मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता था। मोटी मिट्टी की दीवारें ठंडे मौसम में अंदर का तापमान बनाये रखने में मदद करती थीं। आज जब आधुनिक इमारतें पहाड़ों तक पहुंच रही हैं, तब काकती का यह पुराना घर अपने भीतर एक बीते दौर की कहानी समेटे खड़ा है।





