Ranchi (Bhavna Thakur) : माथे की बिंदिया चमकती रहे, हाथों में चूड़ियां खनकती रहे, पैरों की पायल छनकती रहे, पिया संग प्रेम बेला सजती रहे। इसी दुआ और कामना के साथ सुहागिनें सोलह श्रृंगार करके वट वृक्ष का कल सात फेरा लगायेगी। कम से कम 7 और ज्यादा से ज्यादा 108 फेरा लगाने का पुराना रिवाज है। इस साल वट सावित्री पूजा कल यानी 6 जून को है। हिंदू पंचांग के अनुसार, वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस रोज सुहागिनें सुबह जल्दी उठकर नहा-धो व्रत का संकल्प लेती हैं, वहीं सोलह श्रृंगार करके वट वृक्ष के नीचे जाकर पूरे विधि-विधान से पूजा करती है। बरगद के वृक्ष की जड़ में जल अर्पित कर कुमकुम लगाया जाता है, फिर धूप-बाती जला कर वट वृक्ष का फेरा लगाया जाता है। सुहागिनें कच्चा सूत लपेटते हुये वट वृक्ष की परिक्रमा कर पति की दीर्घायु, अच्छी सेहत और खुशहाल जिंदगानी की कामना करती है। कहा जाता है कि वट वृक्ष के तने में भगवान विष्णु, जड़ में ब्रह्मा और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है, इसलिए यह वृक्ष हिंदू धर्म में पूजनीय है।
वट सावित्री व्रत की कथा के अनुसार, सावित्री बड़ी चतुराई और समझदारी से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण बचाती हैं, इसलिए सुहागिनें इस व्रत को बड़े ही श्रद्धा और आस्था के साथ करती हैं। सावित्री को यमराज ने चने के रूप में सत्यवान के प्राण वापस किये थे, जिसे लेकर सावित्री सत्यवान के पास पहुंची थी और उनके पति फिर से जीवित हो गये थे। यही वजह है कि इस व्रत में चने का पूजन किया जाता है और चने को निगलकर इस व्रत का पारण किया जाता है। वट सावित्री के इस पावन पर्व पर प्रिया ने कहा, एक फेरा सजना के सेहत के लिये, एक फेरा प्रेम के लिये, एक फेरा दीर्घायु के लिये, सजना का साथ जीवन भर मिले, एक फेरा सजना और मेरे अटूट प्रेम के लिये, हर सुख-दुख में सजना सदा संग रहे, हर पल साथ निभायें, एक जन्म नहीं सातों जन्म… बस सजना के दुश्मन का अंत और नाश हो… उनपर कभी काले-काया की छाया भी न पड़े। प्रिया यही कामना कर वट सावित्री पूजा की तैयारी में आज रात से ही जुट गई। पल-पल सजना को निहारती सोलह श्रृंगार के सारे सामान बक्शे और मेकअप किट से बाहर निकाल ली। प्रिया ने हौले से यह भी कहा, बिना खाये-पीये व्रत करना प्रेम की अटूट परिभाषा है, हम यूं ही प्रेम बंधन में बंधे रहे, यहीं मेरे दिल की बस पुकार और आस है…
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