spot_img
spot_img
spot_img

मांदर की थाप को GI टैग मिले, पूर्व सांसद महेश पोद्दार ने झोंकी ताकत

Date:

spot_img
spot_img
📖भाषा चुनें और खबर सुनें:
🎙️कोहराम LIVE रेडियो

Ranchi : असम की बिहु ढोल को GI टैग यानी Geographical Indications मिलने के बाद से झारखंड की मांदर की थाप और उसकी मिठास को GI टैग दिलाने की खातिर रांची के पूर्व राज्यसभा सांसद महेश पोद्दार बेहद गंभीर और रेस हो गये हैं। वे इस कोशिश मेंं लग गये है कि देश-दुनिया में झारखंड की अलग पहचान बनी मांदर की थाप को भी GI टैग जैसे कोहिनूर जड़े, ताकि झारखंड के मुकूट में एक और नगीना जड़ जाये। इसके लिये महेश पोद्दार ने मीडिया से लेकर शासन-प्रशासन तक से आग्रह किया है कि वे इस मुहिम में उनका साथ दें।

क्या होता है GI Tag, जानें

किसी भी रीजन का जो क्षेत्रीय उत्पाद होता है, उससे उस क्षेत्र की पहचान होती है। उस उत्पाद की ख्याति जब देश-दुनिया में फैलती है तो उसे प्रमाणित करने के लिए एक प्रक्रिया होती है जिसे GI टैग यानी जीओ ग्राफिकल इंडीकेटर (Geographical Indications) कहते हैं। जिसे हिंदी में भौगोलिक संकेतक नाम से जाना जाता है। साल 1999 के दिसम्बर में संसद ने उत्पाद के रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण को लेकर अधिनियम पारित किया। जिसे अंग्रेजी में Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 कहा गया। इसे 2003 में लागू किया गया। इसके तहत भारत में पाये जाने वाले प्रॉडक्ट के लिए GI टैग देने का सिलसिला शुरू हुआ।

इन्हें मिलता है GI Tag

हैंडीक्राफ्ट्स

जैसे चंदेरी साड़ी, महाराष्ट्र सोलापुर की चद्दर, बनारस की साड़ी, कर्नाटक का मैसूर सिल्क। तमिलनाडु का कांचीपुरम सिल्क।

उत्पाद

मसलन गोवा की फेनी, उत्तर प्रदेश के कन्नौज का इत्र एवं तमिलनाडु का इस्ट इंडिया लेदर आदि।

खाद्य सामग्री

राजस्थान की बीकानेरी भुजिया, हैदराबाद की हलीम, आंध्र प्रदेश के तिरुपति का लड्डू, पश्चिम बंगाल का रसोगुल्ला, मध्य प्रदेश का कड़कनाथ मुर्गा।

खेती से जुड़े उत्पाद

मतलब खेती से जुड़े प्रॉडक्ट जैसे- उत्तराखंड का तेजपात, बासमती चावल, दार्जिलिंग टी, किसी खास किस्म का मसाला और ऐसे ही प्रॉडक्ट, जो एक विशेष क्षेत्र में मिलते हैं।

कैसे मिलता है TG Tag

किसी प्रॉडक्ट के लिए GI Tag हासिल करने के लिए आवेदन देना पड़ता है। उत्पाद को बनाने वाले उत्पादक अप्लाई कर सकते है। वहीं, कोई कलेक्टिव बॉडी अप्लाई कर सकते है। सरकारी स्तर पर भी आवेदन किया जा सकता है।

इन बातों का रखना होता है ख्याल

जीआई टैग अप्लाई करने वालों को यह बताना होगा कि उन्हें यह टैग क्यों दिया जाये। वहीं, प्रूफ भी देना होगा। प्रॉडक्ट की यूनिकनेस के बारे में उसके ऐतिहासिक विरासत के बारे में। क्यों सेम प्रोडक्ट पर कोई दूसरा दावा करता है तो आप कैसे मौलिक हैं यह साबित करना होगा। जिसके बाद संस्था साक्ष्यों और सबंधित तर्कों का परीक्षण करती हैं, मानकों पर खरा उतरने वाले को GI टैग मिलता है।

यहां करना होगा अप्लाई 

Controller General of Patents, Designs and Trade Marks (CGPDTM) के ऑफिस में अप्लाई करना होता है। इस संस्था का हेडक्वाटर चेन्नई में है। ये संस्था एप्लीकेशन चेक करेगी। देखेगी कि दावा कितना सही है। पूरी तरह से छानबीन करने और संतुष्ट होने के बाद उस प्रॉडक्ट को GI टैग मिल जायेगा।

10 साल के लिए मिलता है टैग

GI टैग का सर्टिफिकेट मिलने के बाद उसका इस्तेमाल केवल एक ही समुदाय कर सकता है। जैसे ओडिशा के रसगुल्ला के लिए जो लोगो मिला, उसका इस्तेमाल ओडिशा के लोग कर सकते हैं। रसगुल्ले के डिब्बे पर। GI टैग 10 साल के लिये मिलता है। हालांकि इसे रिन्यू करा सकते हैं। GI टैग मिलने से प्रोडक्ट का मूल्य और उससे जुड़े लोगों की अहमियत बढ़ जाती है। फेक प्रॉडक्ट को रोकने में मदद मिलती है। संबंधित जुड़े हुए लोगों को इससे आर्थिक फायदा भी होता है।

 

spot_img
spot_img
spot_img
spot_img
spot_img

Related articles:

गुमला में खू’न से सनी सुबह, गांव में दहशत…

Gumla : गुमला के रायडीह थाना क्षेत्र में सूरज की...

लातेहार की दो बहनों के साथ पटना में गैंगरेप, न्योता पर गई थी तिलक में…

Latehar : राजधानी पटना के नौबतपुर से इंसानियत को झकझोर...

पुलिस ने छात्राओं को दिये सुरक्षा के मंत्र…

Ranchi : बदलते दौर में अपराध के तौर-तरीके भी...

‘विकास दुबे जैसा कांड कर दूंगा’ वीडियो वायरल…

Bihar : सोशल मीडिया पर वायरल हुआ एक वीडियो...