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अक्षय तृतीया का पर्व क्यों रखता है खास महत्व, जानें

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Kohramlive desk : 14 मई 2021 शुक्रवार को अक्षय तृतीया है। वैशाख शुक्ल तृतीया की महिमा मत्स्य, स्कंद, भविष्य, नारद पुराणों व महाभारत आदि ग्रंथोंं में है। इस दिन किये गये पुण्यकर्म अक्षय (जिसका क्षय न हो) व अनंत फलदायी होते हैं। अत: इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहते हैं। यह सर्व सौभाग्यप्रद है।

  • यह युगादि तिथि यानी सतयुग व त्रेतायुग की प्रारम्भ तिथि है। श्रीविष्णु का नर-नारायण, हयग्रीव और परशुरामजी के रूप में अवतरण व महाभारत युद्ध का अंत इसी तिथि को हुआ था।
  • इस दिन बिना कोई शुभ मुहूर्त देखे कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ या सम्पन्न किया जा सकता है। जैसे – विवाह, गृह – प्रवेश या वस्त्र -आभूषण, घर, वाहन, भूखंड आदि की खरीददारी, कृषिकार्य का प्रारम्भ आदि सुख-समृद्धि प्रदायक है।

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प्रात:स्नान, पूजन, हवन का महत्त्व

  • इस दिन गंगा-स्नान करने से सारे तीर्थ करने का फल मिलता है। गंगाजी का सुमिरन एवं जल में आह्वान करके ब्राम्हमुहूर्त में पुण्यस्नान तो सभी कर सकते हैं। स्नान के पश्चात् प्रार्थना करें।
  • माधवे मेषगे भानौं मुरारे मधुसुदन। प्रात: स्नानेन में नाथ फलद: पापहा भव ॥ हे मुरारे ! हे मधुसुदन ! वैशाख मास में मेष के सूर्य में हे नाथ ! इस प्रात: स्नान से मुझे फल देनेवाले हो जाओ और पापों का नाश करों ।’

सप्तधान्य उबटन व गोझरण मिश्रित जल से स्नान पुण्यदायी है। पुष्प, धूप-दीप, चंदनम अक्षत (साबुत चावल) आदि से लक्ष्मी-नारायण का पूजन व अक्षत से हवन अक्षय फलदायी है।


जाप, उपवास व दान का महत्त्व

इस दिन किया गया उपवास, जाप, ध्यान, स्वाध्याय भी अक्षय फलदायी होता है। एक बार हल्का भोजन करके भी उपवास कर सकते हैं। ‘भविष्य पुराण’ में आता है कि इस दिन दिया गया दान अक्षय हो जाता है। इस दिन पानी के घड़े, पंखे, (खांड के लड्डू), पादत्राण (जूते-चप्पल), छाता, जौ, गेहूं, चावल, गौ, वस्त्र आदि का दान पुण्यदायी है। परंतु दान सुपात्र को ही देना चाहिए।

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पितृ-तर्पण का महत्त्व व विधि

इस दिन पितृ-तर्पण करना अक्षय फलदायी है। पितरों के तृप्त होने पर घर में सुख-शांति-समृद्धि व दिव्य संताने आती है।
विधि : इस दिन तिल एवं अक्षत लेकर विष्णु एवं ब्रम्हाजी को तत्त्वरूप से पधारने की प्रार्थना करें। फिर पूर्वजों का मानसिक आह्वान कर उनके चरणों में तिल, अक्षत व जल अर्पित करने की भावना करते हुए धीरे से सामग्री किसी पात्र में छोड़ दें तथा भगवान दत्तात्रेय, ब्रम्हाजी व विष्णुजी से पूर्वजों की सदगति हेतु प्रार्थना करें।

NOTE : आचार्य आशुकवि पङ्कज ऊमर
अंतराष्‍ट्रीय शोधार्थी भारत
ज्योतिष गुप्तचर विभाग दिल्ली

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