कोहराम लाइव डेस्क : बहुत किस्मत से मिला है यह मानव जीवन। तुलसीदास कहते हैं– बड़े भाग मानुस तन पावा। अगर मनुष्य का शरीर मिला है, तो इसकी सार्थकता इस बात में है कि आप अहं से अपने को मुक्त करने की चेष्टा करें। मनोविज्ञान के अनुसार, अहं यानी ईगो मनुष्य जीवन का अटूट हिस्सा है। यह हर आदमी की एक पहचान है, फिर भी अहंकार इंसानियत को खा जाता है।
सामान्य अहं की बात अलग है, पर कुछ ऐसी जगहें हैं, जहां अहंकार करने का नुकसान उठाना पड़ता है। ईश्वर की कृपा तब मिलेगी, जब आप उसके सामने समर्पित होंगे। संत-महात्मा के सान्निध्य का लाभ तब मिलेगा, जब अहंकार से मुक्त होंगे। जीवन तब सहज होगा, जब आप अहं नहीं करेंगे। कर्तव्य का अमूल्य उपहार पाने के लिए अहंकार का करना होगा परित्याग। इस भाव को समझने के लिए चलिए आपको रूबरू कराते हैं एक कथा से।
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शक्तिशाली राजा और भगवान महावीर
महावीर स्वामी के पास एक राजा अक्सर आया करता था। राजा बहुत शक्तिशाली और धनवान था। वह जब भी महावीर के पास आता तो अपने साथ बहुत सारा धन, रत्न-आभूषण लेकर आता था, लेकिन हर बार महावीर स्वामी राजा से एक ही बात कहते थे, ‘राजन् इन्हें गिरा दो।’ महावीर स्वामी की बात मानकर राजा सभी मूल्यवान चीजों को वहीं गिराकर अपने महल लौट जाता था। राजा को स्वामीजी का ये व्यवहार बहुत बुरा लगता था।
मंत्री ने दी फूल लेकर जाने की सलाह
राजा ने ये बात अपने मंत्री को बताई। मंत्री बहुत बुद्धिमान था। उसने कहा, ‘राजन् इस बार आप सिर्फ फूल लेकर जाइए।’ राजा मंत्री की बात मानकर महावीर के सामने सुंदर फूल लेकर पहुंचा। स्वामीजी ने कहा, ‘इन्हें गिरा दो।’ ये सुनकर राजा निराश हुआ और फूल वहीं गिराकर महल लौट आया और मंत्री को ये बात बताई। मंत्री ने कहा, ‘राजन इस बार आप खाली हाथ जाइए, फिर देखते हैं क्या होता है।’
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एक दिन खाली हाथ गया राजा
राजा अगले दिन खाली हाथ स्वामीजी के सामने पहुंच गया। राजा ने कहा, ‘मैं हर बार आपके लिए मूल्यवान चीजें लेकर आ रहा था, लेकिन आप हर बार उन्हें गिराने के लिए बोल देते थे। फिर मैं फूल लेकर आया। आपने फूलों को भी गिराने के लिए कह दिया। आज मैं खाली हाथ आया हूं। अब बताइए क्या आदेश है ‘महावीर स्वामी मुस्कुराए और बोले, ‘अब खुद को गिरा दो।’ ये बात सुनते ही राजा समझ गए कि महावीर अहंकार गिराने की बात कर रहे हैं।
अहंकार से लुप्त हो जाता है कर्तव्य
इस कहानी के माध्यम से हमें अपने अहंकार को त्यागने की सीख मिलती है। हमेशा याद रखें कि हमारे आसपास कुछ जगहें ऐसी होती हैं, जहां घमंड नहीं करना चाहिए। घर-परिवार में, मंदिरों में, किसी संत-महात्मा के सामने कभी भी अहंकार न करें। अहंकार से कर्तव्य का लोप हो जाता है।
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