Kohramlive : आश्विन माह की कृष्ण अष्टमी, यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि मांओं की ममता का उत्सव है। इस दिन जब सूरज की पहली किरण धरती पर पड़ती है, तो आंगन में रसोई की महक के साथ ही सजने-संवरने की आहट भी सुनाई देती है। क्योंकि यह दिन है जितिया व्रत का, जहां मांयें अपने बच्चों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए उपवास रखती हैं।
लाल, हरे, पीले रंग की साड़ियां, मानो खुशियों की छटा ओढ़ ली हो। सिल्क और चंदेरी की कोमल लहराती बुनावट, औरतों की आस्था को परंपरा की डोर में बांध देती है।
झुमके, चूड़ियां और मांगटीका, यह केवल आभूषण नहीं, बल्कि मातृत्व की शोभा के प्रतीक बन जाते हैं। झूमते झुमके और खनकती चूड़ियां जैसे कह रही हों, आज का दिन केवल संतान के नाम है।
गजरा और बिंदी, ताजे फूलों की खुशबू जब केशों से लिपटती है और माथे पर सजी लाल बिंदी दमकती है, तो हर महिला खुद देवी-स्वरूपा लगती है। उस पल लगता है कि जितिया केवल व्रत नहीं, बल्कि ममता की सबसे सुंदर कविता है, जहां स्त्री का हर श्रृंगार संतान की लंबी आयु की प्रार्थना में ढल जाता है।






