Kohramlive : कभी शिक्षा का अर्थ था सीखना, समझना और खुद को बनाना। पर अब डिजिटल युग में, हर उत्तर कुछ सेकंड में मिल जाता है, वहीं, अब सवाल उठने लगा है, सीख कौन रहा है? इंसान… या कृत्रिम बुद्धि? ऑनलाइन शिक्षा ने दुनिया को खुला आकाश दिया, जहां कोई भी, किसी भी समय, मोबाइल या कंप्यूटर से सीख सकता है। पर इस आजादी के साथ आई एक अदृश्य चुनौती, Generative AI (जैसे ChatGPT)। ये असिंक्रोनस पाठ्यक्रमों (जहां कक्षा लाइव नहीं होती) में शैक्षणिक ईमानदारी के लिये सबसे बड़ा इम्तिहान बन गये हैं। छात्र अब असाइनमेंट, चर्चा, इन्फोग्राफिक्स या वीडियो तैयार करते समय AI की मदद से ऐसा काम जमा करते हैं कि शिक्षक पहचान ही नहीं पाते, यह मेहनत किसकी है, छात्र की या मशीन की? AI पहचानने वाले टूल्स भी अक्सर गलत साबित होते हैं। वे न्यूरोडायवर्जेंट (अलग संज्ञानात्मक शैली वाले) या भाषा सीखने वाले छात्रों को अनुचित रूप से निशाना बनाते हैं। दूसरी ओर, रिमोट प्रॉक्टरिंग यानी कैमरे से निगरानी छात्रों की गोपनीयता और गरिमा पर सवाल खड़े करती है। ड्राफ्ट और वर्जन हिस्ट्री जैसी तकनीकें भी भ्रामक साबित हो रही हैं।
अब जरूरत है नये तरीकों की
शिक्षा अब केवल परीक्षा नहीं, एक विश्वास का अनुबंध बन चुकी है। इसीलिये संस्थानों को अपने ढांचे में बदलाव लाना होगा, जैसे, छोटी मौखिक परीक्षायें, ताकि छात्र की वास्तविक समझ को परखा जा सके। अनुभवात्मक शिक्षण और बाहरी सत्यापन, ताकि ज्ञान सिर्फ लिखने तक सीमित न रहे, बल्कि करने में झलके। सामाजिक, संज्ञानात्मक और शिक्षण उपस्थिति, ताकि छात्र-शिक्षक के बीच वास्तविक जुड़ाव और सोच बनी रहे।
GenAI चुनौती देता है, सीखने की आत्मा को
Generative AI अब सिर्फ सहायता नहीं करता, बल्कि कभी-कभी सोचने का स्थान भी ले लेता है। यह सामाजिक उपस्थिति की नकल करता है, संज्ञानात्मक काम को बदल देता है और शिक्षक को निगरानी में उलझा देता है। पर शिक्षा का सार निगरानी नहीं, मार्गदर्शन है। सीखने की रोशनी वही है जो भीतर से जलती है, न कि वह जो किसी मशीन के उत्तर से टिमटिमाती है।






