कान लगाकर ठीक से सुनें कोई बात, गलत अर्थ समझे तो….

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कोहराम लाइव डेस्क : कहना-सुनना और समझना हमारे जीवन की सामान्‍य प्रक्रिया है। इसके बिना हमारे जीवन का एक कदम भी ठीक से आगे नहीं बढ़ सकेगा। मनुष्‍य हैं, तो बुद्धि है। आपस में संवाद के लिए कहना-सुनना और ठीक से सब कुछ समझना जरूरी है। वाद और विवाद से ही तो संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। यदि सुनने के लिए हम ठीक से कान नहीं देंगे तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। फिर इसके बाद नुकसानदाय परिणाम ही सामने आएगा। ऐसी स्थिति में वाद-विवाद के मर्म से हम विरत हो जाएंगे। इस संदेशपरक बात को हम स्‍वामी विवेकानंद द्वारा अपने शिष्‍यों को सुनाई गई एक कहानी से और स्‍पष्‍टता से समझ सकते हैं।

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गांव के बाहर छोटी सी कुटिया

हम सभी जानते हैं कि स्वामीजी अपने नए शिष्यों को एक कहानी जरूर सुनाया करते थे। वो कहानी ये थी कि किसी गांव के बाहर एक छोटी सी कुटिया थी। कुटिया में एक व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ रहता था। कुटिया के बाहर कुछ झाड़ियां भी थीं। एक दिन उन्हीं झाड़ियों में एक शेर शिकार की तलाश में आकर छिप गया।

संध्या आने वाली है, अपना सारा काम समेट लो

पति ने पत्नी से कहा, ‘संध्या आने वाली है, अपना सारा काम समेट लो।’ ये बात शेर ने भी सुनी। संध्या का अर्थ होता है शाम, लेकिन शेर ने संध्या का अर्थ गलत समझ लिया। शेर ने सोचा संध्या कोई बड़ी शक्ति होगी, जिसके आने के डर से ये आदमी काम समेटने की बात कर रहा है। ये विचार आते ही डर की वजह से शेर थोड़ा और पीछे जाकर छिप गया।

अपने गधे को तलाश रहा था आदमी

उसी समय गांव के एक आदमी का गधा कहीं चला गया था। वह अपने गधे को ढूंढ रहा था। रात हो चुकी थी तो अंधेरा हो गया। गधे को ढूंढते-ढूंढते वह आदमी गांव के बाहर उस कुटिया के पास पहुंच गया। उसने देखा कि झाड़ियों के पीछे कोई छिपा हुआ है।

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शेर को जोर से मारा डंडा

वह आदमी झाड़ियों के पास गया और जोर से एक डंडा मारा। डंडा शेर को लगा, लेकिन उस आदमी ने सोचा ये गधा है। आदमी ने शेर के ऊपर अपना सामान रखा और दो डंडे और मार दिए। शेर को लगा कि शायद यही संध्या है। डरा हुआ शेर आदमी के पीछे-पीछे उसका सामान उठाकर चलने लगा। रास्ते में एक और शेर आ गया।

रास्‍ते में मिला दूसरा शेर

दूसरे शेर ने छिपकर देखा कि उसके मित्र की ये हालत कैसे हो गई। उसने डरे हुए शेर से इसकी वजह से पूछी। पहले शेर ने कहा, ‘संध्या आ चुकी है, ये बहुत शक्तिमान है। इसके डर से सभी इंसान अपना काम और सामान समेट रहे हैं। इसने मुझे डंडे भी मारे हैं। इसीलिए मैं डर गया हूं।’

गधा समझकर मार रहा डंडे

दूसरे शेर ने कहा, ‘तुम गलत बात से डर रहे हो। ये इंसान है और तुम्हें गधा समझकर डंडे मार रहा है। जबकि तुम शेर हो। तुमने संध्या का गलत अर्थ समझ लिया है।’

क्‍या मिलती है सीख

इस कहानी का सार और भाव यह है कि हमें किसी भी बात को सावधानीपूर्वक सुनना चाहिए। सुनने में लापरवाही कुछ से कुछ करा सकती है। लापरवाही के कारण किसी भी बात का गलत अर्थ समझ लेंगे। इससे नुकसान हो सकता है। अधूरी और गलत जानकारी हमारे लिए परेशानियां बढ़ा देती है। इसीलिए सोच-समझकर किसी नतीजे पर पहुंचचने के प्रति सदा सतर्क रहें।

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