कोहराम लाइव डेस्क : सावधान हो जाइए। शराब पीकर गाड़ी चलाने की आदत से बाज आइए। ऐसी तकनीक का रास्ता सरकार ने खोज निकाला है कि यदि कोई व्यक्ति पैग मारकार अपनी कार स्टार्ट करेगा, तो तकनीक गाड़ी को रोक देगी। गाड़ी नहीं बढ़ सकेगी। सरकार शीघ्र ही कारों में ऐसी डिवाइस लाने जा रही है। इससे ड्रंकन ड्राइविंग से होने वाले सड़क हादसों पर एक हद तक लगाम लगा सकेगी।
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दो साल में शराब पीकर गाड़ी चलाने से 40983 हादसे
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक साल 2016 से 2018 तक देशभर में शराब पीकर गाड़ी चलाने की वजह से 40983 दुर्घटनाएं हुईं। मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 185 में शराब पीकर गाड़ी चलाने के अपराध के लिए कारावास या जुर्माने की सजा या दोनों का ही प्रावधान है। बावजूद इसके शराब पीकर ड्राइविंग करने वालों की तदाद में कोई कमी नहीं आ रही है।
पुलिस के लिए मुश्किल
सरकार ने ट्रैफिक पुलिस को ड्रंकन ड्राइविंग रोकने के लिए एल्कोमीटर दे रखे हैं, लेकिन इनकी संख्या भी बेहद सीमित है। साथ ही कोरोना काल में इनके इस्तेमाल पर रोक लगी हुई है। इसके कारण केवल ब्लड सेंपल लेकर ही नशे मे ड्राइविंग करने वालों की जांच की जा सकती है। इसके साथ में दूसरी समस्या ये है कि इसके लिए डॉक्टर और उच्च अधिकारियों की अनुमति लेनी आवश्यक है। ट्रैफिक पुलिस के यह पता लगाना मुश्किल होता है कि कौन ड्राइवर नशे में है। केवल उसके हावभाव जैसे तेज ड्राइविंग या जिगजैग ड्राइविंग से ही एसे लोगों का पता लगाया जा सकता है।
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अल्कोहल इग्निगेशन इंटरलॉक डिवाइस
पुलिस की मजबूरी को देखते हुए सरकार ने वाहनों में अल्कोहल इग्निगेशन इंटरलॉक डिवाइस लगाने की मंजूरी दे दी है। इससे शराब के नशे में वाहन चलाने वाले लोगों पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकेगा। इस डिवाइस को कार के इंजन के साथ लगाया जाएगा और जैसे ही ड्राइवर कार ड्राइव करने के लिए बैठेगा, तो उसे पहले इस डिवाइस में फूंक मारनी होगी। इसके बाद यह डिवाइस जान लेगी कि ड्राइवर नशे में है या सामान्य है।
दो चरणों में डिवाइस लगाने का प्लान
सरकार इस डिवाइस को गाड़ियों में चरणों में लगाएगी। पहले फेज में इसे केवल कार के साथ कनेक्ट किया जाएगा। पुराने बड़े मोबाइल फोन जैसी दिखने वाली इस डिवाइस को कार के इग्निगेशन से जोड़ा जाएगा। जैसे ही ड्राइवर कार में बैठेगा, तो इग्निगेशन देने से पहले उसे डिवाइस के ऊपर लगे पाइप पर फूंक मारनी होगी। अगर ड्राइवर नशे में होगा तो डिवाइस के डिस्प्ले पर फेल लिखा दिखाई देगा और इंजन स्टार्ट नहीं होगा।
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कई देशों में इस तकनीक का हो रहा इस्तेमाल
कई देशों में इस तकनीक को पहले से इस्तेमाल किया जा रहा है और वहां ड्रंकन ड्राइविंग से होने वाले हादसों में काफी कमी देखी गई है। वहां भी इस डिवाइस की सटीकता पर सवाल उठाए गए हैं। 2017 में अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रीवेंटिंव मेडिसिन में छपी एक स्टडी के मुताबिक इन डिवाइसेज की रीडिंग सटीक नहीं होती है और इनकी कीमत और लगाने का खर्च काफी ज्यादा है। ये डिवाइसेज लगने के बाद वहां मुकदमे काफी संख्या में बढ़ गए, क्योंकि लोगों ने निजता के अधिकार के उल्लंघन का हवाला दिया।












