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शोरूम से बाहर निकलते ही क्यों घट जाती है कार की वैल्यू… जानें

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Kohramlive : नई कार खरीदना किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार के लिये एक सपना होता है। वर्षों की बचत, बैंक लोन और ढेर सारी उम्मीदों के बाद जब घर के बाहर नई कार खड़ी होती है, तो वह किसी सपने के सच होने जैसा लगता है। लेकिन इस खुशी के पीछे एक ऐसा सच छिपा है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। जिस कार के लिये आप लाखों रुपये खर्च करते हैं, उसकी कीमत शोरूम से बाहर निकलते ही कम होने लगती है। यही वजह है कि कुछ साल बाद वही कार सेकंड हैंड बाजार में अपनी मूल कीमत से काफी कम दाम पर बिकती है। तो आखिर ऐसा क्यों होता है? आइए समझते हैं कार की कीमत घटने का पूरा गणित।

क्या होता है कार डिप्रिसिएशन?

ऑटोमोबाइल की दुनिया में किसी वाहन की कीमत समय के साथ कम होने की प्रक्रिया को डिप्रिसिएशन (Depreciation) कहा जाता है। सरल भाषा में कहें तो जैसे-जैसे कार पुरानी होती जाती है, उसकी बाजार कीमत घटती जाती है। यह नियम लगभग हर वाहन पर लागू होता है, चाहे वह एक छोटी हैचबैक हो या करोड़ों की लग्जरी कार। फर्क सिर्फ इतना होता है कि कुछ कारों की कीमत धीरे-धीरे घटती है, जबकि कुछ मॉडल तेजी से अपनी वैल्यू खो देते हैं। यही वह सवाल है जो अक्सर लोगों के मन में आता है। असल में जब तक कार शोरूम में खड़ी रहती है, तब तक उसे पूरी तरह नई माना जाता है। लेकिन जैसे ही उसका रजिस्ट्रेशन होता है और वह ग्राहक के नाम पर ट्रांसफर होती है, वह तकनीकी रूप से “यूज्ड कार” की श्रेणी में आ जाती है। भले ही कार सिर्फ 5 या 10 किलोमीटर चली हो, लेकिन बाजार की नजर में वह अब नई नहीं रहती। इसी वजह से उसकी कीमत में तत्काल गिरावट दर्ज हो जाती है।

इन खर्चों का पैसा कभी वापस नहीं मिलता

जब आप कार खरीदते हैं, तो सिर्फ एक्स-शोरूम कीमत ही नहीं चुकाते। आपकी जेब से इन चीजों पर भी रकम खर्च होती है, रोड टैक्स, आरटीओ रजिस्ट्रेशन फीस, इंश्योरेंस प्रीमियम, हैंडलिंग चार्ज एवं अन्य सरकारी शुल्क।  लेकिन जब आप कार बेचने जाते हैं, तो नया खरीदार इन खर्चों का भुगतान नहीं करता। वह सिर्फ कार की वर्तमान स्थिति और बाजार मूल्य देखकर कीमत तय करता है। यानी इन अतिरिक्त खर्चों की भरपाई दोबारा बिक्री में नहीं हो पाती।

पहले साल में सबसे बड़ा झटका

ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों के मुताबिक, एक नई कार अपने पहले ही साल में लगभग 15 से 25 प्रतिशत तक मूल्य खो सकती है। कुछ मॉडलों में यह गिरावट इससे भी ज्यादा होती है।उदाहरण के तौर पर अगर आपने 10 लाख रुपये की कार खरीदी है, तो एक साल बाद उसकी कीमत 7.5 से 8.5 लाख रुपये तक रह सकती है। यही कारण है कि कई लोग बिल्कुल नई कार खरीदने के बजाय 1-2 साल पुरानी सेकंड हैंड कार खरीदना पसंद करते हैं।

किन बातों से तय होती है रीसेल वैल्यू?

किसी कार की दोबारा बिक्री की कीमत सिर्फ उसकी उम्र पर निर्भर नहीं करती। कई अन्य बातें भी अहम भूमिका निभाती हैं।

बाजार में मांग

जिस मॉडल की बाजार में मांग ज्यादा होती है, उसकी रीसेल वैल्यू भी मजबूत रहती है।

सर्विस रिकॉर्ड

समय पर सर्विस और मेंटेनेंस कराने वाली कार खरीदारों को ज्यादा भरोसा देती है।

माइलेज और कंडीशन

कम चली हुई और अच्छी स्थिति में मौजूद कार बेहतर कीमत दिला सकती है।

एक्सीडेंट हिस्ट्री

अगर वाहन किसी बड़े हादसे का हिस्सा रहा है, तो उसकी कीमत पर सीधा असर पड़ता है।

ओडोमीटर रीडिंग

कार जितनी ज्यादा चली होगी, उसकी रीसेल वैल्यू उतनी ही कम हो सकती है।

नया मॉडल आते ही पुरानी कार क्यों हो जाती है सस्ती?

ऑटोमोबाइल कंपनियां लगातार नये मॉडल और फेसलिफ्ट वर्जन लॉन्च करती रहती हैं। जैसे ही बाजार में किसी कार का नया अवतार आता है, पुराने मॉडल की मांग घटने लगती है। खरीदार नई तकनीक, नये फीचर्स और नये डिजाइन की तरफ आकर्षित होते हैं। इसका सीधा असर पुराने मॉडल की कीमत पर पड़ता है और उसकी रीसेल वैल्यू नीचे आने लगती है।

क्या सेकंड हैंड कार खरीदना समझदारी है?

कई मामलों में जवाब है, हां। क्योंकि नई कार की कीमत में जो शुरुआती बड़ी गिरावट आती है, उसका नुकसान पहला मालिक झेल चुका होता है। ऐसे में दूसरी बार खरीदने वाले व्यक्ति को कम कीमत में बेहतर स्थिति वाली कार मिल सकती है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में सेकंड हैंड कारों का बाजार तेजी से बढ़ा है।

कार खरीदते समय यह बात हमेशा याद रखें

नई कार सुविधा, भरोसा और नई शुरुआत का एहसास देती है। लेकिन इसे निवेश समझने की भूल नहीं करनी चाहिये। कार एक ऐसी संपत्ति है जिसकी कीमत समय के साथ बढ़ती नहीं, बल्कि घटती है। इसलिये कार खरीदते समय उसकी रीसेल वैल्यू, ब्रांड की विश्वसनीयता और रखरखाव की लागत पर भी जरूर ध्यान देना चाहिये। क्योंकि कई बार समझदारी सिर्फ नई कार खरीदने में नहीं, बल्कि सही कार चुनने में होती है।

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