Kohramlive : सुबह की वह कोमल किरणें, जो परदों के बीच से कमरे में उतरती हैं, और बिस्तर पर पड़े इंसान के हाथ सबसे पहले खोजते हैं, मोबाइल फोन। अलार्म बंद होता है, पर नोटिफिकेशंस की बाढ़ शुरू हो जाती है। नींद के मीठे सपनों की जगह अचानक सामने आ जाते हैं, दूसरों की कामयाबी, दूसरों की खुशियां और ऑफिस की मेल्स का बोझ। यहीं से दिन का रंग बदल जाता है, जहां होना चाहिये था सुकून का सवेरा, वहां छा जाती है स्ट्रेस और बेचैनी की धुंध। सुबह का दिमाग तो बिल्कुल कोरे कागज जैसा होता है। पर जैसे ही स्क्रीन पर नजर पड़ती है, ब्लू लाइट और सूचनाओं की भीड़ उस कागज पर अनगिनत धब्बे छोड़ देती है। फोकस और शांति की जगह भर जाती है थकान और चिड़चिड़ापन। दिनभर की प्रोडक्टिविटी जैसे नींद में ही कहीं खो जाती है।
आंखें, शरीर और रिश्तों की कहानी
वह मासूम आंखें, जिन्हें सुबह सूरज की रोशनी से चमकना चाहिये था, मोबाइल की ठंडी नीली रोशनी से दुखने लगती हैं।
बिस्तर पर करवट लिये, गर्दन झुकाये फोन स्क्रॉल करता इंसान, अनजाने में अपनी रीढ़ को, अपनी सेहत को खोखला करने लगता है। वहीं, सबसे बड़ा नुक़सान? वह पल जो परिवार के साथ बीतना था, वह प्यार जो सुबह की चाय में घुलना था, वह सब इंटरनेट के शोर में गुम हो जाता है।
एक सीख
सुबह का पहला घंटा, वह तो खुद से मिलने का वक्त है, पानी के घूंट में ताजगी खोजने का वक्त है, परिवार के साथ मुस्कुराहट बांटने का वक्त है। अगर यह कीमती समय मोबाइल की गिरफ्त में दे दिया, तो पूरा दिन थकान, तनाव और दूरी से भर जाता है। सवेरा आपका है, उसे नोटिफिकेशंस की बंधक मत बनने दीजिये।
इसे भी पढ़ें : SDM की छापेमारी, गोदाम सील…












