Kohramlive : सावन आते ही देशभर में भगवान शिव के भक्तों के बीच आस्था का उत्सव शुरू हो जाता है। इन्हीं पवित्र परंपराओं में सबसे खास है कांवड़ यात्रा, जिसमें लाखों शिवभक्त पवित्र नदियों से गंगाजल लेकर कांवड़ में भरते हैं और अपने आराध्य भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। कांवड़ यात्रा केवल पैदल चलकर जल लाने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह भक्ति, तप, संयम और आत्मअनुशासन का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ की गई कांवड़ यात्रा से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस साल कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक चलेगी। हालांकि, मुख्य कांवड़ यात्रा का महत्व 11 अगस्त तक माना जायेगा, क्योंकि इसी दिन सावन शिवरात्रि का पर्व मनाया जायेगा। परंपरा के अनुसार, अधिकांश कांवड़िये सावन शिवरात्रि के दिन भगवान शिव को गंगाजल अर्पित कर अपनी यात्रा पूर्ण करते हैं।
इन दिनों जलाभिषेक का विशेष महत्व
सावन महीने में भगवान शिव को किसी भी दिन श्रद्धा से जल चढ़ाया जा सकता है। हालांकि, कुछ तिथियों को विशेष शुभ माना जाता है, जैसे, सावन के सभी सोमवार, नाग पंचमी, सावन शिवरात्रि। वर्ष 2026 में सावन शिवरात्रि 11 अगस्त को होगी। इस दिन श्रद्धालु अपनी परंपरा और सुविधा के अनुसार भगवान शिव का जलाभिषेक कर सकेंगे।
कौन था पहला कांवड़िया?
कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर कई पौराणिक और लोक कथायें प्रचलित हैं। किसी एक कथा को ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में नहीं माना जाता, बल्कि इन्हें धार्मिक आस्था और परंपराओं के रूप में देखा जाता है। सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम को पहला कांवड़िया माना जाता है। कथा के अनुसार, उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से पवित्र गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के पुरा महादेव मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। मान्यता है कि इसी परंपरा से कांवड़ में जल लाकर भगवान शिव को अर्पित करने की शुरुआत हुई।
श्रवण कुमार की कथा भी जुड़ी है कांवड़ परंपरा से
एक अन्य लोककथा श्रवण कुमार से जुड़ी है। कहा जाता है कि श्रवण कुमार अपने वृद्ध और नेत्रहीन माता-पिता को कांवड़ जैसी संरचना में बैठाकर तीर्थ यात्रा पर ले गये थे। हालांकि यह कथा मुख्य रूप से माता-पिता की सेवा और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है, लेकिन कई लोग इसे कांवड़ परंपरा की प्रेरणा से भी जोड़ते हैं।
रावण से जुड़ी मान्यता भी है प्रचलित
कुछ धार्मिक कथाओं में लंकापति रावण का भी उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने ग्रहण किया था, जिससे उनके शरीर में उत्पन्न ताप को शांत करने के लिये रावण ने कांवड़ में गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया था।
कांवड़ यात्रा का महत्व
कांवड़ यात्रा श्रद्धालुओं के लिये आत्मसंयम और साधना का मार्ग मानी जाती है। यात्रा के दौरान भक्त सात्विक जीवन अपनाते हैं, नियमों का पालन करते हैं और लगातार भगवान शिव का स्मरण करते हैं। कई श्रद्धालु नंगे पैर यात्रा पूरी करते हैं, जबकि कुछ विशेष संकल्प लेकर मौन व्रत या अन्य धार्मिक नियमों के साथ यात्रा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा, पवित्र भाव और नियमों के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक करने से जीवन की बाधायें दूर होती हैं, मन को शांति मिलती है और महादेव की कृपा प्राप्त होती है।
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