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गढ़वा स्थापना दिवस : 35 वर्षों का सफर-संघर्ष, बदलाव और उम्मीदों की नई रोशनी

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Garhwa(Nityanand Dubey) : जब 1 अप्रैल 1991 को गढ़वा अनुमंडल ने पलामू से अलग होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व पाया, तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह जिला अपनी पहचान को संवारते हुये विकास की एक नई गाथा लिखेगा। गढ़वा का यह 35 वर्षों का सफर संघर्षों से भरा रहा—कभी गरीबी, सूखा और पलायन की मार, तो कभी नक्सलवाद की स्याह छाया। लेकिन इन तीन दशकों में यह जिला अपनी बदली हुई तस्वीर के साथ नये सपनों की रोशनी बिखेर रहा है।

संघर्षों से मिली मजबूती

गढ़वा को कभी राष्ट्रीय फलक पर अकाल, बेरोजगारी और पलायन के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। लेकिन वर्षों की मेहनत और सरकारी योजनाओं के चलते यह पहचान धीरे-धीरे बदल रही है। प्रशासन ने हर साल नये विकास कार्यों की आधारशिला रखी, सड़कें बनीं, स्कूल खुले, और आधुनिकता की एक नई लहर चली।

सड़कें बनीं, पर सफर अब भी अधूरा

गढ़वा के आवागमन के क्षेत्र में जबरदस्त सुधार हुआ है। एनएच-75 और 343 जैसे राष्ट्रीय राजमार्गों के माध्यम से इस जिले को पड़ोसी राज्यों से जोड़ने का कार्य किया गया। वर्षों से लंबित गढ़वा बाइपास का निर्माण भी पूरा हुआ, जिससे शहर में वाहनों के दबाव को कम किया जा सका। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी सड़क और परिवहन सेवाएं अपने बेहतर स्वरूप की प्रतीक्षा कर रही हैं।

शिक्षा: उम्मीद की नई किरण

गढ़वा में सामान्य शिक्षा से लेकर तकनीकी और व्यवसायिक शिक्षा तक की सुविधा अब उपलब्ध हो चुकी है। सरकारी विद्यालयों की स्थिति में सुधार के प्रयास तो हुए हैं, लेकिन आज भी 1435 स्कूलों में 1847 शिक्षकों के पद रिक्त हैं। बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। इसके बावजूद, निजी विद्यालयों की बढ़ती संख्या ने विद्यार्थियों के लिए नए अवसर खोल दिये हैं। जिले में नामधारी कॉलेज और बाबू दिनेश सिंह विश्वविद्यालय के रूप में उच्च शिक्षा का नया द्वार खुल चुका है। 1991 में गढ़वा की साक्षरता दर मात्र 39% थी, जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 62% हो गई। यह आंकड़ा विकास की ओर इशारा तो करता है, मगर आज भी कई ऐसे इलाके हैं जहाँ शिक्षा की रोशनी पूरी तरह नहीं पहुंच पाई है।

सिंचाई और कृषि: अधूरे सपनों की कहानी

गढ़वा की 80% आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन सिंचाई की समस्या आज भी बरकरार है। कनहर जलाशय सिंचाई परियोजना दशकों से फाइलों में दबी पड़ी है। सोन-कोयल पाइपलाइन जलापूर्ति योजना उम्मीद की एक किरण जरूर दिखाती है, लेकिन इसकी धीमी गति ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। हर साल खेत सूख जाते हैं, और किसान राहत की आस में मौसम को ताकते रह जाते हैं।

रोजगार के अवसर घटे, निराशा बढ़ी

गढ़वा कभी लाह, केंदू पत्ता, वन्य उत्पादों और घी उत्पादन के लिये जाना जाता था, लेकिन समय के साथ ये रोजगार के साधन खत्म होते चले गए। जंगलों की कटाई और उद्योगों की कमी ने लोगों को मजबूर किया कि वे जीविका की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करें। भवनाथपुर में स्थापित सेल की खदानें भी बंद हो गईं, जिससे हजारों लोगों का रोजगार छिन गया। हर चुनाव में रोजगार एक बड़ा मुद्दा बनता है, लेकिन वादे कागजों तक ही सिमट जाते हैं।

स्वास्थ्य सुविधाएं: आधे-अधूरे प्रयास

गढ़वा में स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार तो हुआ है, लेकिन आपातकालीन सेवाओं की अब भी कमी है। गंभीर मरीजों को बेहतर इलाज के लिय् दूसरे जिलों का रुख करना पड़ता है।

अब भी बाकी है अधूरे सपनों का सफर

गढ़वा जिले का 35 वर्षों का सफर कई मायनों में बदलाव का प्रतीक है, लेकिन यह सफर अब भी अधूरा है। आयकर विभाग, बिक्री कर विभाग और जिला सर्व कार्यालय जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्यालयों की अनुपस्थिति लोगों को अब भी पलामू जिले पर निर्भर रहने को मजबूर करती है। 35 साल बाद भी यह जिला अपने सपनों की तलाश में है—जहां हर खेत में पानी हो, हर घर में रोजगार हो, और हर सड़क विकास की ओर जाती हो। गढ़वा ने अपनी पहचान बदलनी शुरू कर दी है, लेकिन इसे पूरी तरह बदलने के लिये एक नये संकल्प, नये प्रयासों और नई उम्मीदों की जरूरत है।

 

 

 

 

 

 

 

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