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अतीत के झरोखे से @जलियांवाला बाग कांड

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KohramLive Desk : इतिहास के पन्नों में सितमग़र जनरल डायर को लोग आज भी नहीं भूल पाए। वहीं जान की आहूती देने वाले की याद सबके मन में हिलोर मारती है। उनकी क़ुर्बानी और बातें आज भी ज़िंदा है। 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग़ कांड का नाम आते ही सितमगर जनरल डायर के ज़ुल्मों सितम की याद ताज़ा हो जाती है। अंग्रेज़ अपनी हुकूमत क़ायम रखना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने जब जिसे चाहा बिना जुर्म के जेल में डाल देने का “रोलेट एक्ट” बना रखा था। उनके इस मर्ज़ी के ख़िलाफ़ गोलबंद हुए शूरवीर जलियांवाला बाग में इकट्ठा होकर पुरज़ोर विरोध कर रहे थे। तभी क्रूर शासक़ की छवि हासिल करने वाले जनरल डायर के हुक्म पर उनके सैनिकों ने निहत्थों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर एक काला अध्याय लिख दिया। जलियांवाला बाग अमृतसर में है। इस हत्याकांड में जान देने वाले शूरवीरों को हर कोई करता है नमन।

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