Garhwa(Nityanand Dubey) : गढ़वा की धरती पर बसी परहिया जनजाति की पीड़ा मानो पत्थरों में भी चीख उठी थी। गेरुआसोती गांव के बाहर जंगली इलाके में टपकती झोपड़ियों के बीच रह रहे ये परिवार हाथियों के आतंक और बेबसी के कारण अपने ही पैतृक गांव बहेरवा से पलायन कर गये थे। मिट्टी की झोंपड़ियां, बच्चों की डरी-सहमी आंखें और महिलाओं के चेहरे पर चिंता की लकीरें, यह नजारा लोकतंत्र की गूंजती सभाओं से परे, जीवन की कठोर सच्चाई बयां कर रहा था।
मीडिया रिपोर्टों ने जब इस दर्द को उजागर किया, तो सदर SDO संजय कुमार खुद गेरुआसोती पहुंचे। उन्होंने परिवारों की कहानी सुनी, कैसे हाथियों के हमले उनकी नींद, उनका घर और उनका भविष्य सब कुछ छीन ले गये। वहीं मौके पर पहुंचे BDO सह-CO यशवंत नायक ने बताया कि परहिया परिवारों के लिये पीएम जन-मन योजना के तहत आवास पहले ही स्वीकृत हो चुके हैं और पहली किस्त की राशि भेजी जा चुकी है। परिवारों की महिलाएं राजकुमारी परहिया, चिंता देवी परहिया और गीता देवी परहिया ने कहा कि कागजों पर घर तो मिल गया, मगर सड़क न होने से ईंट-बालू गांव तक पहुंचाना टेढ़ी खीर है। इस पर SDO ने स्पष्ट आदेश दिया कि परिवारों को घर बनाने में परिवहन की हर मदद दी जायेगी और एक महीने के भीतर निर्माण का काम शुरू होगा।
हाथियों का डर और बच्चों का भविष्य
सिर्फ आशियाने ही नहीं, हाथियों से सुरक्षा भी बड़ी चुनौती है। SDO ने वन विभाग को भी सक्रिय कदम उठाने के निर्देश दिये। वहीं गेरुआसोती में अस्थायी रूप से रह रहे बच्चों को शिक्षा से न वंचित होने देने का वादा किया गया, उन्हें स्थानीय विद्यालय में दाखिल कराने की कोशिश होगी। जनगणना 2011 में बहेरवा की आबादी 47 थी, आज यह बढ़कर करीब 70 हो गई है। पर अफसोस, गांव की गिनती तो बढ़ी, मगर घरों की रौनक हाथियों के खौफ में उजड़ गई।








