Hazaribagh : बरसों पुरानी परंपरायें जब सांस लेती हैं, तो वो सिर्फ रीत नहीं रहतीं, वो बन जाती हैं श्रद्धा की श्वास, विश्वास की गवाही। ऐसा ही दृश्य था हजारीबाग के जुलजुल सीतागढ़ा स्थित ऐतिहासिक गौशाला में, जहां 120वीं बार गोपाष्टमी मेले का आयोजन हुआ। शंखों के नाद, घंटियों की गूंज और भक्ति से भीगी हवा में जब श्रद्धालुओं ने गायों के चरणों में चारा और गुड़ अर्पित किया, तो हर चेहरे पर आस्था की चमक थी, वहीं, “गौ माता की जय” के साथ पूरा वातावरण पवित्र हो उठा हो। साल 1905 में स्थापित यह गौशाला करुणा, सेवा और राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक है। 1857 की क्रांति के बाद जब गोरक्षा आंदोलन ने देशभर में नई चेतना जगाई, उसी भावना की लौ से इस गौशाला की नींव रखी गई। 82 एकड़ में फैली यह भूमि आज भी 500 से अधिक गायों का सुरक्षित आश्रय है, कुछ सड़कों से बचाई गईं, कुछ तस्करों के चंगुल से छुड़ाई गईं। गौशाला परिसर में बने राधे-कृष्ण मंदिर में आरती के साथ मेले की शुरुआत हुई। कोई गौ माता को हरे चारे से तृप्त कर रहा था, कोई उनके गले में माला डाल रहा था। बच्चों की हंसी, बुजुर्गों की भक्ति और महिलाओं की सेवा, सबने मिलकर ऐसा दृश्य रचा कि लगा, यह भूमि स्वयं दिव्यता से सराबोर हो उठी है। मेला परिसर रंग-बिरंगे स्टॉलों, स्वास्थ्य शिविरों और हस्तशिल्प प्रदर्शनों से सजा था। हर कोने से उठती अगरबत्ती की महक और भक्ति की लहरें वातावरण को स्वर्गीय बना रही थीं। 120 वर्षों से जीवित यह परंपरा हर पीढ़ी को यह सिखा रही है कि “सेवा ही सबसे सुंदर पूजा है।”
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