Saraikela : सरायकेला-खरसांवा के बंता नगर की एक साधारण सी गली, पानी टंकी से सटा एक चमचमाता जनरल स्टोर। बाहर से देखने में यह एक सामान्य दुकान, लेकिन भीतर सपनों को जला देने वाला धुआं। राजा उर्फ मुकेश प्रजापति, एक ऐसा नाम जिसने गुमटी से शुरुआत की और देखते ही देखते वन विभाग की जमीन पर खड़ा कर लिया अपना साम्राज्य। पर यह साम्राज्य जहर का था, हुक्के की खुशबू में छिपा जहर, चिलम के कशों में छिपी बर्बादी और निकोटिन की नकली चमक में डूबी जवानी। सरायकेला-खरसांवा की हाई सोसाइटी से लेकर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों तक, राजा का जाल बिछा था। भोले-भाले किशोरों की जिज्ञासा को उसने लत में बदल डाला। एक सप्ताह पहले डीएवी एनआईटी के बच्चे पकड़े गये, पर सच दबा दिया गया। लेकिन सच छुपता कितने दिन? पुलिस की नजर बाज की तरह मंडरा रही थी। और फिर, RIT के थानेदार संजीव सिंह की अगुवाई में छापामारी की गई। दुकान के शटर उठे और परत दर परत अंधेरा खुलता गया, हुक्का, चिलम, नकली पिस्तौल, लोहे के कड़े, इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट और वो सारे सामान जो एक मासूम छात्र को गुंडा-नशेड़ी बना सकता था। उस रात सिर्फ दुकान नहीं टूटी, एक साम्राज्य हिला। राजा की काली कमाई के मलबे में दबी दिखीं बच्चों की अधूरी कॉपियां, बिखरे सपने, और बाप की उम्मीदों के धुंधले चेहरे।
धुयें का साम्राज्य, नकली चमक में डूबी जवानी…
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