Palamu : कभी ये जंगल हाथियों की गर्जना से गूंजते थे, पेड़ों की शाखाओं पर हवा के साथ झूमते साये उन झुंडों का स्वागत करते थे। मगर आज वही जंगल चुप हैं। सिर्फ सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट सुनाई देती है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की 2025 की रिपोर्ट ने इस सन्नाटे की सच्चाई को आंकड़ों में बयां कर दिया है, 2017 में झारखंड में हाथियों की संख्या 678 थी, 2025 में यह घटकर मात्र 217 रह गई, यानी 68% की चौंकाने वाली कमी। झारखंड में अब सबसे ज्यादा हाथी पलामू टाइगर रिजर्व (PTR) में करीब 130 बचे हैं। वहीं, दलमा और सारंडा के जंगलों से हाथी झुंड बनाकर पलायन कर रहे हैं। कई हाथी झारखंड छोड़कर ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश तक पहुंच गये हैं। हाथियों के पलायन के पीछे कारण वही पुराने हैं, इंसानी अतिक्रमण, माइनिंग का जहर, जंगलों की बेरहम कटाई। हाथियों के पारंपरिक रास्ते मिटते जा रहे हैं और साथ में उनकी सदियों पुरानी जमीन से रिश्ता मिट रही है। 2005 से अब तक इंसान और हाथियों के बीच संघर्ष बढ़ा है। 2005–2014 के बीच 576 और 2019–2024 के बीच 474 लोगों की मौत हो चुकी है। सबसे ज्यादा मामले रांची, हजारीबाग, गढ़वा और लातेहार में दर्ज हुये। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि “यह सिर्फ संख्या में गिरावट नहीं, यह जंगल के दिल की धड़कन के धीमे पड़ने की कहानी है।”अगर संरक्षण और सख्त मॉनिटरिंग पर अब भी ध्यान नहीं दिया गया तो झारखंड से हाथियों का नामोनिशान मिट जाना किसी बड़े हादसे से कम नहीं होगा।
झारखंड छोड़ रहे हाथी, चौंकाने वाली बातें… जानें
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