Bihar : भोजपुरी की मिट्टी से उठी वह आवाज, जिसने समाज की कुरीतियों को मंच पर लाकर कटघरे में खड़ा कर दिया, आज भी सम्मान की बाट जोह रही है। महान लोककवि, नाटककार और समाज सुधारक भिखारी ठाकुर की 138वीं जयंती पर पूरा बिहार और देश उन्हें नमन कर रहा है, लेकिन यह नमन एक बार फिर एक तीखा सवाल छोड़ गया, क्या केवल स्मरण काफी है, या सम्मान भी जरूरी है? 18 दिसंबर 1887, सारण जिले के कुतुबपुर गांव में जन्मे भिखारी ठाकुर का जीवन संघर्षों की पाठशाला था। नौ साल की उम्र में पहली बार स्कूल देखा। सीमित अक्षर ज्ञान, लेकिन पूरा रामचरित मानस कंठस्थ रट लिये। मवेशी चराये, रोजगार की तलाश में खड़गपुर तक भटके। इन्हीं संघर्षों ने उन्हें आम आदमी के दुख-दर्द से जोड़ा। मेदिनीपुर में रामलीला देखी और भीतर का कलाकार जाग उठा। पारंपरिक पेशा छोड़ उन्होंने लोककला को जीवन बना लिया। गांव लौटे, लोक कलाकारों की मंडली बनाई और भोजपुरी साहित्य को नई दिशा दी। ‘बिदेसिया’, ‘बेटी-बियोग’, ‘बिधवा-बिलाप’, ‘गबरघिचोर,’ ये सिर्फ नाटक नहीं थे, समाज के जख्मों पर रखी उंगली थे। नारी पीड़ा, पलायन, विधवा जीवन, हर विषय में करारा सच था। जयंती पर कुतुबपुर में राजकीय समारोह हुआ। अधिकारियों ने प्रतिमा पर माल्यार्पण किया, लेकिन परिजनों का दर्द जस का तस है। उनका कहना है। साल में एक-दो दिन श्रद्धांजलि देकर सरकार अपना फर्ज पूरा मान लेती है, जबकि भिखारी ठाकुर भारत रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान के हकदार हैं।








