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यादगार बना CM योगी का जन्मदिन, अद्भुत है रामदरबार… देखें

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UP : एक ओर जहां आम लोग जन्मदिन पर केक काटते हैं, वहीं यूपी  के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपना 53वां जन्मदिन प्रभु श्रीराम के चरणों में समर्पित कर दिया। गुलाबी सुबह, मंत्रों की गूंज और अयोध्या की पावन धरती पर गुरुवार को एक ऐतिहासिक पल दर्ज हो गया।

CM योगी आदित्यनाथ, अपने जन्मदिन पर सीधे रामनगरी अयोध्या पहुंचे। सबसे पहले रामलला के दर्शन किये, फिर हनुमानगढ़ी में शीश नवाया। लेकिन असली दृश्य तो राम मंदिर के प्रथम तल पर देखने को मिला, जहां बने भव्य राम दरबार में प्राण प्रतिष्ठा के लिए वे मुख्य यजमान बने। भोर के अभिजीत मुहूर्त में 101 वैदिक आचार्यों के साथ मंत्रोच्चार शुरू हुआ। हर ओर गूंज रहे थे “जय श्रीराम” के जयकारे। चंदन की खुशबू, शंख की ध्वनि और राम दरबार की मूर्तियों में बसती नई चेतना, यह दृश्य सिर्फ आंखों से नहीं, भावनाओं से देखा जा सकता था।

प्रथम तल पर बना पंडाल छोटा जरूर था, पर उसकी भव्यता किसी महल से कम नहीं। कार्यक्रम में सुरक्षा का भी खास इंतजाम रहा। ATS से लेकर PAC और सिविल पुलिस तक हर कोई मुस्तैद रहा। मंदिर परिसर आधुनिक उपकरणों से लैस और श्रद्धा से परिपूर्ण था। इस विशेष दिन पर सीएम योगी मणिराम दास छावनी भी पहुंचे, जहां उन्होंने महंत नृत्यगोपाल दास के जन्मोत्सव में भाग लिया। साथ ही सरयू के किनारे सरयू महोत्सव का उद्घाटन भी किया। इस खास मौके पर आंजनेय सेवा संस्थान के अध्यक्ष शशिकांत दास ने जो कहा, वह लोगों की जुबां पर चढ़ गया “त्रेतायुग में वशिष्ठ जी ने श्रीराम का राजतिलक किया था, और कलियुग में योगी जी ने रामलला को टाट से उठाकर सिंहासन पर बैठाया है।

श्रीराम जन्मभूमि पर बन रहा भव्य मंदिर केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि स्थापत्य और विज्ञान की गूंजती हुई गाथा है। मंदिर के प्रथम तल पर विराजमान होने जा रहे राम दरबार की भव्यता, दिव्यता और शिल्प का तेज ऐसा है कि संगमरमर की चमक तक श्रद्धा से निहाल हो उठी है। यह कोई सामान्य पत्थर नहीं, बल्कि चालीस वर्षों से अपने भाग्य की प्रतीक्षा करती वह शिला है, जिसे आज प्रभु श्रीराम के श्रीचरणों में समर्पित किया जा रहा है।

प्रसिद्ध मूर्तिकार सत्य नारायण पांडेय, जिनकी उंगलियों से देवताओं के स्वरूप जन्म लेते हैं, कहते हैं “इस संगमरमर को जितना धोओ, वह उतना ही निखरता है जैसे भक्ति में डूबा मन।”छह महीनों तक चले इस पत्थर की तलाश में वैज्ञानिकों ने भी अपना ज्ञान समर्पित किया। IIT हैदराबाद की प्रयोगशालाओं से होते हुए जब यह शिला धर्म और विज्ञान दोनों की कसौटियों पर खरी उतरी, तभी जाकर इसे अंतिम रूप मिला।

 

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