Ranchi : गांव की कच्ची गलियों पर जब CM हेमंत सोरेन के कदम पड़े, तो मिट्टी ने जैसे अपने बेटे को पहचान लिया। हवा में महक थी खेतों की, और पत्तों में सरसराहट थी जैसे पुरानी यादों का गीत गा रही हो। पैतृक नेमरा में CM न केवल एक जनसेवक थे, बल्कि उस बेटे की तरह थे, जो अपने पिता की परछाई लेकर लौट आया हो। गांव की हर नजर में उन्हें केवल मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन की छवि के रूप में देखा गया, वही सरल मुस्कान, वही अपनापन, वही जल-जंगल-जमीन से अटूट मोह। “गुरुजी ने सिखाया कि राजनीति सत्ता नहीं, सेवा है” ये शब्द CM हेमंत सोरेन के होंठों पर थे और आंखों में पिता की यादों की नमी। वे किसानों से बातें कर रहे थे, बच्चों के सिर पर हाथ फेर रहे थे, और दूर तक फैले खेतों को देखकर जैसे खुद से वादा कर रहे थे, यह धरती हरियाली से भरी रहेगी, आने वाली पीढ़ियों के लिये।जल, जंगल और जमीन, उनके लिये ये सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा हैं। यही आत्मा उनके हर फैसले में, हर योजना में और हर विकास कार्य में सांस लेती है। नेमरा की शाम उस दिन कुछ और थी, सूरज की लालिमा खेतों पर बिखरी थी, और गांव के लोग अपने “हेमंत बाबू” के साथ समय बिताने को गर्व से भरे थे। सादगी और संकल्प का यह संगम, पिता की शिक्षा और बेटे के कर्म का यह मेल, झारखंड की कहानी को और गहरा बना गया।
नेमरा की पगडंडियों पर लौटे CM, पिता की विरासत संग
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