Kohramlive : आचार्य चाणक्य ने कहा था, “मनुष्य का शरीर केवल आग से ही नहीं जलता, कुछ ऐसे दर्द भी हैं जो भीतर से भस्म कर देते हैं।” वह छह बातें जिनसे घिरा इंसान अंदर ही अंदर जलने लगता है :
पत्नी का वियोगः जीवनसाथी का बिछोह, आत्मा का आधा हिस्सा कटकर अलग हो जाये। यह पीड़ा किसी भी आग से अधिक तपाती है।
अपमानः जब अपने ही आपको तिरस्कार की अग्नि में धकेल दें, तो आत्मसम्मान राख बन जाता है। यही सबसे बड़ा दाह है।
ऋण का बोझः कर्ज इंसान को चैन से सोने नहीं देता। यह बोझ ऐसा है जो सांसों तक को भारी कर देता है।
दुष्ट की सेवाः दुष्ट के अधीन काम करने वाला हर दिन भीतर से जलता है, क्योंकि उसे अपने आत्मसम्मान को कुचलना पड़ता है।
गरीबीः गरीबी की चुभन हर क्षण आत्मा को झुलसाती है। यह केवल जेब खाली नहीं करती, मन की शांति भी छीन लेती है।
दरिद्रों की सभाः जहां अज्ञान और मूर्खता का बोलबाला हो, वहां बैठना विद्वान के लिये सबसे बड़ा दंड है। उसका मन भीतर-ही-भीतर तपता है।
चाणक्य का संदेश, इन छह दुखों से जितनी जल्दी दूरी बना लें, उतना ही जीवन शांत और सुखमय होगा। वरना ये आग बिना शोला दिखाये ही इंसान को राख बना देती है।
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