Bihar : बिहार की मिट्टी से उठी एक गूंज, जिसने न सिर्फ किसानों की पीड़ा को आवाज दी, बल्कि पूरे भारत के स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी। यह गूंज थी पंडित राजकुमार शुक्ल की। आज यानी 23 अगस्त को उनकी जयंती पर हम नमन करते हैं उस किसान-नायक को, जिसने महात्मा गांधी को चंपारण बुलाकर इतिहास का सबसे बड़ा सत्याग्रह रच दिया। चंपारण की धरती पर अंग्रेजों की थोपी गई तिनकठिया प्रथा ने किसानों का जीवन नरक बना दिया था। हर किसान मजबूर था कि अपनी जमीन का तीन हिस्सा नील की खेती को दे। भूख, निर्धनता और शोषण उनकी किस्मत बन गई थी।
ऐसे दौर में राजकुमार शुक्ल ने संकल्प लिया,“अब और अन्याय नहीं सहेंगे।” वे गांव-गांव घूमे, किसानों को जगाया, उन्हें संगठित किया और उनकी मौन कराह को क्रांति की आवाज में बदल दिया।
गांधीजी को चंपारण लाने का श्रेय
1915 में जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से लौटे, वे भारत में किसी आंदोलन की राह तलाश रहे थे। इसी समय, शुक्ल जी ने अटूट आग्रह और असीम धैर्य से गांधीजी को चंपारण लाने का संकल्प लिया। इतिहास गवाह है 4 जून 1917, रांची के ऑड्रे हाउस में गवर्नर एडवर्ड गेट और गांधीजी की बैठक हुई। यहीं से बदल गई भारत की दिशा। गांधीजी चंपारण पहुंचे और देखा किसानों का दर्द। और शुरू हुआ भारत का पहला सत्याग्रह।
चंपारण सत्याग्रह, एक नई सुबह
1917 का चंपारण सत्याग्रह सिर्फ किसानों की जीत नहीं था। यह वो अलख थी, जिसने पूरे देश को दिखाया सत्य और संकल्प से बड़े से बड़ा साम्राज्य भी झुक सकता है। अंग्रेजों को तिनकठिया प्रथा समाप्त करनी पड़ी। और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ने पहली बड़ी जीत हासिल की।
आज की सीख
पंडित राजकुमार शुक्ल का जीवन हमें सिखाता है –
- अन्याय के विरुद्ध संघर्ष ही सच्ची देशभक्ति है।
- संगठन और सामूहिक शक्ति हर दीवार तोड़ सकती है।
- सत्य और अहिंसा की राह कठिन ज़रूर है, पर अंत में वही विजय दिलाती है।
नोटः यह लेख पंडित राजकुमार शुक्ल फाउंडेशन के अध्यक्ष अजय राय के लेख पर आधारित है।










